गुरुवार, 21 अगस्त 2025

यात्रा .....परली बैजनाथ : ज्योतिर्लिंग

     जैसे कि मैने पहले बताया था , मैं पुणे बेटे के पास आया हुआ था , कि मेरे छोटे भ्राता श्री नरेंद्र का फोन आया , कि  आप चूंकि पुणे में  है ,तो क्यों ना  राखी  के अवसर पर हैदराबाद निवासी हमारी छोटी बहन के पास जा कर ,उसके साथ क्यों ना रखी के त्योहार  मनाए । इसके लिए मैं भी देहरादून से परसों तक हैदराबाद पहुंच जाऊंगा ,तो आप भी वही आ जाएं ,!  बस फिर क्या था , तुरंत ,अगले दिन ट्रेन पकड़ी और पहुंच गया " हैदराबाद "!
      खुशी खुशी राखी का त्योहार मानने के बाद ,जब मैं पुणे वापसी की ट्रेन खोज ही रहा था कि संयोगवश ,परली बैजनाथ की ट्रेन दिख गई , और मुझे स्मरण हो आया कि यहां भी दो ज्योतिर्लिंग है जिन्हे परली बैजनाथ कहते हैं ,साथ ही यहां से 60 किलोमीटर दूरी पर एक और ज्योतिर्लिंग हैं जिसे " ओढ़ा नागनाथ " के नाम से पुकारते हैं !अब आप सोच रहे होंगे कि इनका नाम तो अपने पूर्व में कभी सुना ही नहीं है ,तो सुना तो मैंने भी पहली ही बार था ,पर जब अनेकों परिचित महाराष्ट्रीयों एवम लोकल समाचार पत्रों आदि से इनके बारे में ज्ञात हुआ कि समस्त महाराष्ट्र के निवासी इन्हे ज्योतिर्लिंग के रूप में ही मानते है तो फिर क्या था , सावन और अधिक का महीना चल ही रहा था तो इनके दर्शन की मेरी इच्छा और बलवती हो गई ,एक तो इन नए ज्योतिर्लिंगों के प्रथम बार दर्शन और वो भी इस पवित्र समय में ,यानी ,आम के आम और गुठली के दाम !!
  हैदराबाद से सीधी ट्रेन रात कोई साढ़े दस बजे चलती थी और सुबह सात बजे परली पहुंचती थी ,जहां पर परली बैजनाथ नाम का ज्योतिर्लिंग था तथा वहां से करीब 150 किलोमीटर की दूरी पर ,    " औंधा नागनाथ " नाम का ज्योतिर्लिंग था ,यानी एक ही दिन में , दोनो ज्योतिर्लिंग के दर्शन का सौभाग्य मिल रहा था तो बस , छोटे भाई की स्वीकृति के साथ ,गुगल बाबा की खोज , एवम  मदद के साथ कि किस तरह हम इन दोनो ज्योतिर्लिंग के दर्शन कम से कम समय में,एक ही दिन में कर सकते है , कि  कौन सी ट्रेन , हमे आराम से यहां ले जायेगी और वापस पहुंचा देगी ।अब, हाथों हाथ ,ट्रेन में सीट भी रिजर्व हो गई तो ,चल पड़े ,हैदराबाद से परली बैजनाथ और नागनाथ जी के दर्शन को ! ,!
      ट्रेन ने ठीक सुबह 7 बजे परली नाम के स्टेशन पर पहुंचा दिया ,ट्रेन से उतरे ,देखा ,बहुत ही आम सा,छोटा सा स्टेशन है ये ! ,बाहर निकले तो समझ भी आ गया की ये भी  एक आम सा ही शहर है जिनकी लाइफलाइन भी ,प्रसिद्ध मंदिर ही होते हैं ।   
    स्टेशन से बाहर निकलते ही ,रात्रि की थकान उतारने को सामने दिख रहे छोटी छोटी  नाश्ते की दुकानों की ओर ,गरमागरम चाय पीने के लिए पहुंच गए ।चाय के घूंट भरते ही ,दुकानदार से पूछ ही लिया की भैया ,यहां से परली ज्योतिर्लिंग का मंदिर कितनी दूर है तो पता लगा की लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर है ।अब ना तो हम इस शहर से परिचित और ना ही यहां के रास्तों से तो निर्णय लिया कि एक ऑटो वाले की मदद से चलते है । सामने ही खड़े एक अच्छे " दिखने "  वाले ऑटो चालक से ,जब मंदिर जाने के लिए पूछा तो उसने तुरंत ही स्वीकृति मे गर्दन हिला दी ।स्वभाव के अनुसार कितने पैसे लोगे तो उत्तर सुनकर तुरंत हमने भी स्वीकृति में अपना सर भी हिला दिया और चल पड़े श्री परली बैजनाथ  ज्योर्तिलिंग मंदिर की ओर ! 
     अभी कुछ ही दूर चले थे की चालक ने पूछा ,क्या आप मंदिर दर्शन से पहले स्नान आदि करना चाहेंगे तो ,हम दोनो भाइयों ने भी संस्कार एवम आदत के स्वरूप स्वीकृति दे दी पर ,कहां  ,तो चालक तुरंत हमे समीप ही एक आम से होटल में ले गया और ,दो व्यक्तियों के लिए ,उसने होटल वाले से 200 रुपए में ,हमारे स्नान आदि की व्यवस्था भी कर वादी ।
       स्नान के पश्चात ,बाहर खड़े चालक ने हमे कुछ देर की यात्रा के पश्चात,इस छोटे से शहर के एक किनारे पर स्थित, एक विशाल, प्राचीन परंतु भव्य मंदिर के मुख्य गेट के सामने उतर दिया ।
    अब हमारे सामने थी ,विशाल पत्थरों से बनी ,काफी चौड़ी और लगभग एक सौ सीढियां जो कोई 50 फुट ऊपर ,मंदिर के प्रवेश द्वार की ओर जा रही थी।हमारे सामने ,कुछ भिखारी भी ,तमाम हिंदुओं के मंदिर की ही तरह डेरा जमाए हुए बैठे थे ।सीढ़ियों के एक और तो मंदिर से संबंधित ,कार्यालय के कमरे बने हुए थे तो दूसरी ओर ,यात्रियों के निवास के लिए एक बड़ी सी धर्मशाला दिखाई दे रही थी ।हां ,एक बात तो बताना भूल गया कि इस पत्थरों की विशाल सीढ़ियों पर लोहे की जाली लगे ,रेलिंग लगी हुई थी जो बहुत अधिक भीड़ के समय ,यात्रियों को ,इन्ही रेलिंग के मध्य ,दाईं ओर बाईं ओर घुमाते हुए ऊपर ,मंदिर के दरवाजे की ओर ले जाती थी ताकि ,मंदिर दर्शन को आती भीड़ को इस
 तरह लाइनों में लगा कर धाकामुक्की से बचा सकें ।चूंकि आज बिलकुल भी भीड़ नही थी  इस लिए हम शीघ्रता से मुख्य दरवाजे पर कुछ ही मिनटों में पहुंच गए ।
    थोड़ी सी रूटीन सिक्योरिटी चेकिंग के बाद हमने मंदिर के अंदर प्रवेश किया तो देखा ,इस मंदिर के अंदर , उसके चारों ओर बना ,एक विशाल परकोटे की दीवारों से घिरा एक गैलरी नुमा आंगन था जिसके ठीक मध्य में एक बड़ा मंदिर दिखाई दे रहा था । इस प्राचीन पत्थरों से निर्मित दीवारों और फर्श पर चले हुए हम,एक दूसरे ,मगर छोटे से दरवाजे के अंदर पहुंचे  तो देखा ,हमारी लाइन हमे मंदिर की दीवारों से चिपकाते हुए , गर्भ गृह के अंदर ले जा रही है तो दूसरी लाइन से भी, किनारे से ,भक्त जन  दर्शन करने के पश्चात ,बाहर आ रहें थे 
  इन्ही सीढ़ियों के एक और बने क्लॉक रूम में जब  हम  अपने बैग को जमा करवा चुके  थे वहीं वहीं ज्ञात हुआ  कि  मंदिर के अंदर मोबाइल अंदर जा सकते हैं ।
    अब परकोटे से मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश किया तो अंदर एक बड़ा सा मुख्य हाल दिखाई दिया , जिसकी दीवारों पर चारों ओर ,फ्रेम में मंधी बहुत सारे व्यक्तियों की फोटो टंगी हुई थी ,परंतु उनके नीचे ,महाराष्ट्रीय भाषा में उनका परिचय लिखे होने से ,हम उनके बारे में कुछ भी नही जान पाए ।

  अब यहां हमने जो देखा ,वो हमारे लिए एक बड़े ही विस्मय और कोतूहल का विषय बन गया । प्रायः दुनिया में ,भारत सहित जितने भी शिव मंदिर ,शिवालय ,प्राचीन हों या आधुनिक ,उनके प्रवेश द्वार के सामने "" नंदी "" की मूर्ति अवश्य होती है ,लेकिन ...   इस हाल के ठीक मध्य में एक नहीं,तीन ,जी हां ,तीन नंदी की मूर्तियां स्थापित थी।एक बात ओर ,जो हमारे कोतूहल को और बढ़ा रहा था कि  ये तीनों मूर्तियां एक समान आकर की नहीं हो कर ,तीन अलग अलग आकर की थी । सबसे बाईं ओर की पहली सबसे बड़ी ,उसके बाद ,मध्य में उस से कुछ छोटी ,फिर उसके बात ,दाईं ओर उस से भी छोटी थी ।इसी उत्सुलता के कारण ,आखिर कार  ,हमने सामने खड़े एक पुजारी जी से ही ,इनके आकार एवं ,एक के स्थान पर ,तीन तीन नंदी की स्थापना का कारण पूछ ही लिया तो जो हमें उत्तर मिल ,वो अद्भुत ,तार्किक और हमारे पूर्वजों की काल गणना के बारे में था ।
उनके अनुसार ,कहते है कि परली  गांव में एक राक्षस का निवास था जो प्रायः इस स्थान में रहने वाले निवासियों को मारता रहता था ,जिसके कारण ,परली नाम का एक वैद्य ने भगवान भोलेनाथ की तपस्या की ।उसके फलस्वरूप ,भोलेनाथ जी ने भयंकर युद्ध के बाद ,उस राक्षस का वध किया ,परंतु फिर भी उनका क्रोध समाप्त नहीं हुआ ,ओर उनका क्रोध एक तीव्र ज्वाला में बदल गया । उनको शांत करने के एवं उनकी ज्वाला की दग्धता से बचने के लिए से यम यहां ब्रह्मा जी आए और शिव जी को प्रसन्न करने के लिए उसके सामने एक नंदी की और स्थापना की ,फिर भी शिवजी के क्रोध रूपी अग्नि की ज्वाला शांत नहीं हुई ।तब स्वयं श्री विष्णु जी भी यहां आए और शिवाजी के क्रोध रूपी ज्वाला को शांत करने के लिए उनकी प्रार्थना की तथा इस के लिए उन्होंने भी एक अन्य नंदी की मूर्ति की स्थापना की ।
      अंततः श्री विष्णु जी एवं ब्रह्मा जी प्रार्थना से शिवजी की क्रोध रूपी ज्वाला शांत हुई और उन्होंने इस हेतु ,उस वैद्य को वरदान मांगने को कहा ।वैद्य ने कहा ,की प्रभु आप स्वयं ,श्री विष्णु एवं ब्रह्मा के साथ संयुक्त रूप से यही रहने और जो पिछे एक छोटी सी पहाड़ी है उस पर आप कुष्ठ रोग सहित ,समस्त रोगों के उपचार के लिए जड़ी बूटियों की भी स्थापना करने की कृपा करें।
         तब से मान्यता है कि ये "" परली बैजनाथ " पूर्व में "" वैद्यनाथ "" के नाम से प्रसिद्ध हुआ ,हालांकि कालांतर में ,वैद्यनाथ शब्द का अपभ्रंश "" बैजनाथ "" हो गया,साथ ही आज भी अनेक योग्य वैद्य ,इस मंदिर पीछे जो पहाड़ी स्थित है ,उस से प्राप्त जड़ी बूटियों से ,अनेकों रोगों का उपचार करते है ।साथ ही आज भी इस मंदिर के सामने ,एक नहीं ,तीन नंदी की मूर्ति स्थापित है।
       ये तीनों नंदी,एक साथ, सामने एक छोटे से गर्भ गृह में स्थापित काले रंग के , फूल मालाओं ,आदि से सजे शिव लिंग की ओर देख रहे प्रतीत होते है।
  हाल के दोनो किनारों पर ,रेलिंग के अंदर धीरे धीरे दर्शनार्थी ,मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश कर रहे थे और ज्योतिर्लिंग के दर्शन के पश्चात दूसरी वाली लाइन से बाहर आ भी रहे थे ।धीरे धीरे जब हम गर्भ गृह के दरवाजे पर पहुंचे तो देखा की चौखट पर एक विशाल कछुए की प्रतिकृति बनी हुई है ।पूरी चौखट और दरवाजे ,शुद्ध चांदी से ,जिस पर शिव जी से संबंधित कथाएं ,चित्र के रूप में उकेरी गईं थी ,ढके हुए थे ।पूरे वातावरण में ओम नमः शिवाय के घोष के साथ साथ ,रिकार्ड पर शिव जी के महामंत्र गूंज रहे थे ।
    जैसे ही हम गर्भ गृह से शिवलिंग के सामने आए तो तो देखा की उसके दोनो ओर बैठे पुजारी बड़े ही धैर्य और शांति के साथ ,एक एक यात्री से पूजन सामग्री को ले रहे थे ,उसे एक लोटे में भर कर स्वयं ही जल दे रहे थे जिसे वो सब लगातार शिव लिंग के ऊपर चढ़ा रहे थे ।इस दौरान वे लगातार शिव जी की आराधना के लिए मंत्र पढ़ भी रहे थे । जब यात्री दर्शन पूजा करने बाद वापस चलते थे तो वे उन्हें प्रसाद रूप में एक फल या चिरोंजी के मीठे दाने भी दे रहे थे ।सबसे बड़ी बात कि वे किसी भी दर्शनार्थी से पैसों की मांग नही कर रहे थे ।जिसकी जो श्रद्धा हो ,वो चढ़ा रहा था ! 
    हमने भी बड़ी ही शांति एवम एकाग्र चित्त के साथ ,संयोग वश मिले ,इस अनुपम सौभाग्य का लाभ उठाया और ,पूजा के पश्चात गर्भ गृह से बाहर निकल आए । 
      बाहर परकोटे में परिक्रमा करते हुए हमने देखा कि ,इस परकोटे की एक दीवार के किनारे बहुत सारे पंडित ,पूरे महाराष्ट्र की अनोखी वेश भूषा में बैठे ,आते जाते दर्शनार्थियों की ,विभिन्न  इच्छाओं की पूर्ति हेतु ,सामने आसन पर उन्हें बिठाकर , पूजा करवा रहे थे। अब चूंकि हमारी तो फिलहाल एक ही इच्छा थी कि इस ज्योतिर लिंग के दर्शन आराम से हो जाएं ,जिसके लिए हम इतनी दूर से आए थे , और वो इच्छा भी पूरी हो चुकी ही थी तो हम एक बार उन पुजारियों को नमन करते हुए मंदिर की सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए ,बाहर सड़क पर आ गए ।
     सड़क पर खड़े हो कर जब घड़ी में समय देखा तो अभी सुबह के दस ही बजे थे ।ये शायद पहला ही अनुभव था की अभी तक हमने जितने भी ज्योतिर्लिंगों के दर्शन किए थे उनमें सबसे कम समय और सब से कम असुविधा ,इसी " परली बैजनाथ " ज्योतिर्लिंग धाम के दर्शनों में हुई थी ।
    तभी सामने खड़े उसी ओटो चालक ने हमे आवाज दी । शायद वो अभी तक यहीं खड़ा था ।चूंकि सुबह से हमने केवल चाय ही पी थी तो अब तक भूख भी जोर से अपने लगने का अहसास कराने लगी थी ।हमने फिर से उसी चालक से कहा की वो हमें किसी बढ़िया से खाने के होटल में ले चले ।
   कुछ ही देर में ,इस छोटे से शहर में घूमते घुमाते एक रेस्टोरेंट में ले गया । मीनू में पूड़ी आलू देख कर हमने उसी का ऑर्डर दे दिया उस ही उस चालक से भी हमने खाने को कह दिया। खाना खाने के बाद हमें जिस दृष्टि से उस चालक ने ,मन ही मन हमें जो धन्यवाद  दिया था ,उसे व्यक्त करने के लिए किसी भी भाषा के किसी भी शब्द की आवश्यकता हमें नही पड़ी थी ।
    भोजन करते हुए जब हमने उस से "" औंधा नागनाथ "" ज्योतिर्लिंग जाने के लिए कोई ट्रेन ,बस या टैक्सी के बारे में पूछा तो उसने बताया कि ठीक 11 एक बस सीधे वहीं चलती है तो चलिए मैं आपको तुरंत वहीं ले चलता हूं । कुछ ही देर में हम इस छोटे से शहर के छोटे से बस स्टेंड पर खड़े थे और खड़ी थी ,सामने ,औंधा नागनाथ ,जाने वाली बस । कमाल की बात थी की इसके बाद शाम के 4  बजे ही बस वहां के लिए जाती थी , फिर इस से भी कमाल की बात कि उस ओटो चालक ने हमसे ,मंदिर से यहां बस स्टेंड छोड़ने के ,तमाम अनुरोधों के बाद भी कोई किराया लेने से स्पष्ट इनकार करता रहा ।
     लगभग आधे घंटे बाद हम ,महाराष्ट्र सरकार की इस खटारा बस पर ,लगभग खटारा सी सड़क पर हिचकोले खाते हुए 150 किलोमीटर दूर स्थित ,दूसरे ज्योतिर्लिंग "" औंधा नाग नाथ "" मंदिर की ओर बढ़े जा रहे थे ।


   ( शेष क्रमश :    : : अगले भाग में ) 

    




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