गुरुवार, 21 अगस्त 2025

यात्रा .....परली बैजनाथ : ज्योतिर्लिंग

     जैसे कि मैने पहले बताया था , मैं पुणे बेटे के पास आया हुआ था , कि मेरे छोटे भ्राता श्री नरेंद्र का फोन आया , कि  आप चूंकि पुणे में  है ,तो क्यों ना  राखी  के अवसर पर हैदराबाद निवासी हमारी छोटी बहन के पास जा कर ,उसके साथ क्यों ना रखी के त्योहार  मनाए । इसके लिए मैं भी देहरादून से परसों तक हैदराबाद पहुंच जाऊंगा ,तो आप भी वही आ जाएं ,!  बस फिर क्या था , तुरंत ,अगले दिन ट्रेन पकड़ी और पहुंच गया " हैदराबाद "!
      खुशी खुशी राखी का त्योहार मानने के बाद ,जब मैं पुणे वापसी की ट्रेन खोज ही रहा था कि संयोगवश ,परली बैजनाथ की ट्रेन दिख गई , और मुझे स्मरण हो आया कि यहां भी दो ज्योतिर्लिंग है जिन्हे परली बैजनाथ कहते हैं ,साथ ही यहां से 60 किलोमीटर दूरी पर एक और ज्योतिर्लिंग हैं जिसे " ओढ़ा नागनाथ " के नाम से पुकारते हैं !अब आप सोच रहे होंगे कि इनका नाम तो अपने पूर्व में कभी सुना ही नहीं है ,तो सुना तो मैंने भी पहली ही बार था ,पर जब अनेकों परिचित महाराष्ट्रीयों एवम लोकल समाचार पत्रों आदि से इनके बारे में ज्ञात हुआ कि समस्त महाराष्ट्र के निवासी इन्हे ज्योतिर्लिंग के रूप में ही मानते है तो फिर क्या था , सावन और अधिक का महीना चल ही रहा था तो इनके दर्शन की मेरी इच्छा और बलवती हो गई ,एक तो इन नए ज्योतिर्लिंगों के प्रथम बार दर्शन और वो भी इस पवित्र समय में ,यानी ,आम के आम और गुठली के दाम !!
  हैदराबाद से सीधी ट्रेन रात कोई साढ़े दस बजे चलती थी और सुबह सात बजे परली पहुंचती थी ,जहां पर परली बैजनाथ नाम का ज्योतिर्लिंग था तथा वहां से करीब 150 किलोमीटर की दूरी पर ,    " औंधा नागनाथ " नाम का ज्योतिर्लिंग था ,यानी एक ही दिन में , दोनो ज्योतिर्लिंग के दर्शन का सौभाग्य मिल रहा था तो बस , छोटे भाई की स्वीकृति के साथ ,गुगल बाबा की खोज , एवम  मदद के साथ कि किस तरह हम इन दोनो ज्योतिर्लिंग के दर्शन कम से कम समय में,एक ही दिन में कर सकते है , कि  कौन सी ट्रेन , हमे आराम से यहां ले जायेगी और वापस पहुंचा देगी ।अब, हाथों हाथ ,ट्रेन में सीट भी रिजर्व हो गई तो ,चल पड़े ,हैदराबाद से परली बैजनाथ और नागनाथ जी के दर्शन को ! ,!
      ट्रेन ने ठीक सुबह 7 बजे परली नाम के स्टेशन पर पहुंचा दिया ,ट्रेन से उतरे ,देखा ,बहुत ही आम सा,छोटा सा स्टेशन है ये ! ,बाहर निकले तो समझ भी आ गया की ये भी  एक आम सा ही शहर है जिनकी लाइफलाइन भी ,प्रसिद्ध मंदिर ही होते हैं ।   
    स्टेशन से बाहर निकलते ही ,रात्रि की थकान उतारने को सामने दिख रहे छोटी छोटी  नाश्ते की दुकानों की ओर ,गरमागरम चाय पीने के लिए पहुंच गए ।चाय के घूंट भरते ही ,दुकानदार से पूछ ही लिया की भैया ,यहां से परली ज्योतिर्लिंग का मंदिर कितनी दूर है तो पता लगा की लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर है ।अब ना तो हम इस शहर से परिचित और ना ही यहां के रास्तों से तो निर्णय लिया कि एक ऑटो वाले की मदद से चलते है । सामने ही खड़े एक अच्छे " दिखने "  वाले ऑटो चालक से ,जब मंदिर जाने के लिए पूछा तो उसने तुरंत ही स्वीकृति मे गर्दन हिला दी ।स्वभाव के अनुसार कितने पैसे लोगे तो उत्तर सुनकर तुरंत हमने भी स्वीकृति में अपना सर भी हिला दिया और चल पड़े श्री परली बैजनाथ  ज्योर्तिलिंग मंदिर की ओर ! 
     अभी कुछ ही दूर चले थे की चालक ने पूछा ,क्या आप मंदिर दर्शन से पहले स्नान आदि करना चाहेंगे तो ,हम दोनो भाइयों ने भी संस्कार एवम आदत के स्वरूप स्वीकृति दे दी पर ,कहां  ,तो चालक तुरंत हमे समीप ही एक आम से होटल में ले गया और ,दो व्यक्तियों के लिए ,उसने होटल वाले से 200 रुपए में ,हमारे स्नान आदि की व्यवस्था भी कर वादी ।
       स्नान के पश्चात ,बाहर खड़े चालक ने हमे कुछ देर की यात्रा के पश्चात,इस छोटे से शहर के एक किनारे पर स्थित, एक विशाल, प्राचीन परंतु भव्य मंदिर के मुख्य गेट के सामने उतर दिया ।
    अब हमारे सामने थी ,विशाल पत्थरों से बनी ,काफी चौड़ी और लगभग एक सौ सीढियां जो कोई 50 फुट ऊपर ,मंदिर के प्रवेश द्वार की ओर जा रही थी।हमारे सामने ,कुछ भिखारी भी ,तमाम हिंदुओं के मंदिर की ही तरह डेरा जमाए हुए बैठे थे ।सीढ़ियों के एक और तो मंदिर से संबंधित ,कार्यालय के कमरे बने हुए थे तो दूसरी ओर ,यात्रियों के निवास के लिए एक बड़ी सी धर्मशाला दिखाई दे रही थी ।हां ,एक बात तो बताना भूल गया कि इस पत्थरों की विशाल सीढ़ियों पर लोहे की जाली लगे ,रेलिंग लगी हुई थी जो बहुत अधिक भीड़ के समय ,यात्रियों को ,इन्ही रेलिंग के मध्य ,दाईं ओर बाईं ओर घुमाते हुए ऊपर ,मंदिर के दरवाजे की ओर ले जाती थी ताकि ,मंदिर दर्शन को आती भीड़ को इस
 तरह लाइनों में लगा कर धाकामुक्की से बचा सकें ।चूंकि आज बिलकुल भी भीड़ नही थी  इस लिए हम शीघ्रता से मुख्य दरवाजे पर कुछ ही मिनटों में पहुंच गए ।
    थोड़ी सी रूटीन सिक्योरिटी चेकिंग के बाद हमने मंदिर के अंदर प्रवेश किया तो देखा ,इस मंदिर के अंदर , उसके चारों ओर बना ,एक विशाल परकोटे की दीवारों से घिरा एक गैलरी नुमा आंगन था जिसके ठीक मध्य में एक बड़ा मंदिर दिखाई दे रहा था । इस प्राचीन पत्थरों से निर्मित दीवारों और फर्श पर चले हुए हम,एक दूसरे ,मगर छोटे से दरवाजे के अंदर पहुंचे  तो देखा ,हमारी लाइन हमे मंदिर की दीवारों से चिपकाते हुए , गर्भ गृह के अंदर ले जा रही है तो दूसरी लाइन से भी, किनारे से ,भक्त जन  दर्शन करने के पश्चात ,बाहर आ रहें थे 
  इन्ही सीढ़ियों के एक और बने क्लॉक रूम में जब  हम  अपने बैग को जमा करवा चुके  थे वहीं वहीं ज्ञात हुआ  कि  मंदिर के अंदर मोबाइल अंदर जा सकते हैं ।
    अब परकोटे से मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश किया तो अंदर एक बड़ा सा मुख्य हाल दिखाई दिया , जिसकी दीवारों पर चारों ओर ,फ्रेम में मंधी बहुत सारे व्यक्तियों की फोटो टंगी हुई थी ,परंतु उनके नीचे ,महाराष्ट्रीय भाषा में उनका परिचय लिखे होने से ,हम उनके बारे में कुछ भी नही जान पाए ।

  अब यहां हमने जो देखा ,वो हमारे लिए एक बड़े ही विस्मय और कोतूहल का विषय बन गया । प्रायः दुनिया में ,भारत सहित जितने भी शिव मंदिर ,शिवालय ,प्राचीन हों या आधुनिक ,उनके प्रवेश द्वार के सामने "" नंदी "" की मूर्ति अवश्य होती है ,लेकिन ...   इस हाल के ठीक मध्य में एक नहीं,तीन ,जी हां ,तीन नंदी की मूर्तियां स्थापित थी।एक बात ओर ,जो हमारे कोतूहल को और बढ़ा रहा था कि  ये तीनों मूर्तियां एक समान आकर की नहीं हो कर ,तीन अलग अलग आकर की थी । सबसे बाईं ओर की पहली सबसे बड़ी ,उसके बाद ,मध्य में उस से कुछ छोटी ,फिर उसके बात ,दाईं ओर उस से भी छोटी थी ।इसी उत्सुलता के कारण ,आखिर कार  ,हमने सामने खड़े एक पुजारी जी से ही ,इनके आकार एवं ,एक के स्थान पर ,तीन तीन नंदी की स्थापना का कारण पूछ ही लिया तो जो हमें उत्तर मिल ,वो अद्भुत ,तार्किक और हमारे पूर्वजों की काल गणना के बारे में था ।
उनके अनुसार ,कहते है कि परली  गांव में एक राक्षस का निवास था जो प्रायः इस स्थान में रहने वाले निवासियों को मारता रहता था ,जिसके कारण ,परली नाम का एक वैद्य ने भगवान भोलेनाथ की तपस्या की ।उसके फलस्वरूप ,भोलेनाथ जी ने भयंकर युद्ध के बाद ,उस राक्षस का वध किया ,परंतु फिर भी उनका क्रोध समाप्त नहीं हुआ ,ओर उनका क्रोध एक तीव्र ज्वाला में बदल गया । उनको शांत करने के एवं उनकी ज्वाला की दग्धता से बचने के लिए से यम यहां ब्रह्मा जी आए और शिव जी को प्रसन्न करने के लिए उसके सामने एक नंदी की और स्थापना की ,फिर भी शिवजी के क्रोध रूपी अग्नि की ज्वाला शांत नहीं हुई ।तब स्वयं श्री विष्णु जी भी यहां आए और शिवाजी के क्रोध रूपी ज्वाला को शांत करने के लिए उनकी प्रार्थना की तथा इस के लिए उन्होंने भी एक अन्य नंदी की मूर्ति की स्थापना की ।
      अंततः श्री विष्णु जी एवं ब्रह्मा जी प्रार्थना से शिवजी की क्रोध रूपी ज्वाला शांत हुई और उन्होंने इस हेतु ,उस वैद्य को वरदान मांगने को कहा ।वैद्य ने कहा ,की प्रभु आप स्वयं ,श्री विष्णु एवं ब्रह्मा के साथ संयुक्त रूप से यही रहने और जो पिछे एक छोटी सी पहाड़ी है उस पर आप कुष्ठ रोग सहित ,समस्त रोगों के उपचार के लिए जड़ी बूटियों की भी स्थापना करने की कृपा करें।
         तब से मान्यता है कि ये "" परली बैजनाथ " पूर्व में "" वैद्यनाथ "" के नाम से प्रसिद्ध हुआ ,हालांकि कालांतर में ,वैद्यनाथ शब्द का अपभ्रंश "" बैजनाथ "" हो गया,साथ ही आज भी अनेक योग्य वैद्य ,इस मंदिर पीछे जो पहाड़ी स्थित है ,उस से प्राप्त जड़ी बूटियों से ,अनेकों रोगों का उपचार करते है ।साथ ही आज भी इस मंदिर के सामने ,एक नहीं ,तीन नंदी की मूर्ति स्थापित है।
       ये तीनों नंदी,एक साथ, सामने एक छोटे से गर्भ गृह में स्थापित काले रंग के , फूल मालाओं ,आदि से सजे शिव लिंग की ओर देख रहे प्रतीत होते है।
  हाल के दोनो किनारों पर ,रेलिंग के अंदर धीरे धीरे दर्शनार्थी ,मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश कर रहे थे और ज्योतिर्लिंग के दर्शन के पश्चात दूसरी वाली लाइन से बाहर आ भी रहे थे ।धीरे धीरे जब हम गर्भ गृह के दरवाजे पर पहुंचे तो देखा की चौखट पर एक विशाल कछुए की प्रतिकृति बनी हुई है ।पूरी चौखट और दरवाजे ,शुद्ध चांदी से ,जिस पर शिव जी से संबंधित कथाएं ,चित्र के रूप में उकेरी गईं थी ,ढके हुए थे ।पूरे वातावरण में ओम नमः शिवाय के घोष के साथ साथ ,रिकार्ड पर शिव जी के महामंत्र गूंज रहे थे ।
    जैसे ही हम गर्भ गृह से शिवलिंग के सामने आए तो तो देखा की उसके दोनो ओर बैठे पुजारी बड़े ही धैर्य और शांति के साथ ,एक एक यात्री से पूजन सामग्री को ले रहे थे ,उसे एक लोटे में भर कर स्वयं ही जल दे रहे थे जिसे वो सब लगातार शिव लिंग के ऊपर चढ़ा रहे थे ।इस दौरान वे लगातार शिव जी की आराधना के लिए मंत्र पढ़ भी रहे थे । जब यात्री दर्शन पूजा करने बाद वापस चलते थे तो वे उन्हें प्रसाद रूप में एक फल या चिरोंजी के मीठे दाने भी दे रहे थे ।सबसे बड़ी बात कि वे किसी भी दर्शनार्थी से पैसों की मांग नही कर रहे थे ।जिसकी जो श्रद्धा हो ,वो चढ़ा रहा था ! 
    हमने भी बड़ी ही शांति एवम एकाग्र चित्त के साथ ,संयोग वश मिले ,इस अनुपम सौभाग्य का लाभ उठाया और ,पूजा के पश्चात गर्भ गृह से बाहर निकल आए । 
      बाहर परकोटे में परिक्रमा करते हुए हमने देखा कि ,इस परकोटे की एक दीवार के किनारे बहुत सारे पंडित ,पूरे महाराष्ट्र की अनोखी वेश भूषा में बैठे ,आते जाते दर्शनार्थियों की ,विभिन्न  इच्छाओं की पूर्ति हेतु ,सामने आसन पर उन्हें बिठाकर , पूजा करवा रहे थे। अब चूंकि हमारी तो फिलहाल एक ही इच्छा थी कि इस ज्योतिर लिंग के दर्शन आराम से हो जाएं ,जिसके लिए हम इतनी दूर से आए थे , और वो इच्छा भी पूरी हो चुकी ही थी तो हम एक बार उन पुजारियों को नमन करते हुए मंदिर की सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए ,बाहर सड़क पर आ गए ।
     सड़क पर खड़े हो कर जब घड़ी में समय देखा तो अभी सुबह के दस ही बजे थे ।ये शायद पहला ही अनुभव था की अभी तक हमने जितने भी ज्योतिर्लिंगों के दर्शन किए थे उनमें सबसे कम समय और सब से कम असुविधा ,इसी " परली बैजनाथ " ज्योतिर्लिंग धाम के दर्शनों में हुई थी ।
    तभी सामने खड़े उसी ओटो चालक ने हमे आवाज दी । शायद वो अभी तक यहीं खड़ा था ।चूंकि सुबह से हमने केवल चाय ही पी थी तो अब तक भूख भी जोर से अपने लगने का अहसास कराने लगी थी ।हमने फिर से उसी चालक से कहा की वो हमें किसी बढ़िया से खाने के होटल में ले चले ।
   कुछ ही देर में ,इस छोटे से शहर में घूमते घुमाते एक रेस्टोरेंट में ले गया । मीनू में पूड़ी आलू देख कर हमने उसी का ऑर्डर दे दिया उस ही उस चालक से भी हमने खाने को कह दिया। खाना खाने के बाद हमें जिस दृष्टि से उस चालक ने ,मन ही मन हमें जो धन्यवाद  दिया था ,उसे व्यक्त करने के लिए किसी भी भाषा के किसी भी शब्द की आवश्यकता हमें नही पड़ी थी ।
    भोजन करते हुए जब हमने उस से "" औंधा नागनाथ "" ज्योतिर्लिंग जाने के लिए कोई ट्रेन ,बस या टैक्सी के बारे में पूछा तो उसने बताया कि ठीक 11 एक बस सीधे वहीं चलती है तो चलिए मैं आपको तुरंत वहीं ले चलता हूं । कुछ ही देर में हम इस छोटे से शहर के छोटे से बस स्टेंड पर खड़े थे और खड़ी थी ,सामने ,औंधा नागनाथ ,जाने वाली बस । कमाल की बात थी की इसके बाद शाम के 4  बजे ही बस वहां के लिए जाती थी , फिर इस से भी कमाल की बात कि उस ओटो चालक ने हमसे ,मंदिर से यहां बस स्टेंड छोड़ने के ,तमाम अनुरोधों के बाद भी कोई किराया लेने से स्पष्ट इनकार करता रहा ।
     लगभग आधे घंटे बाद हम ,महाराष्ट्र सरकार की इस खटारा बस पर ,लगभग खटारा सी सड़क पर हिचकोले खाते हुए 150 किलोमीटर दूर स्थित ,दूसरे ज्योतिर्लिंग "" औंधा नाग नाथ "" मंदिर की ओर बढ़े जा रहे थे ।


   ( शेष क्रमश :    : : अगले भाग में ) 

    




 सुबह 11 बजे से महाराष्ट्र सरकार की बस से लगातार चलते हुए ,लगभग दोपहर के 3 बजे के करीब जब हम औंधा नाग नाथ पहुंचने ही वाले थे कि एक ढाबे पर बस रूकी। कंडकतर महोदय ने उच्च स्वर में घोषणा की कि 15 मिनट के विराम में आप भोजन आदि कर सकते हैं ।बस से उतरने के बाद जब हमने पूछा की अब औंधा नागनाथ कितनी दूर है तो उत्तर मिला ,पास में ही कोई 2 किलोमीटर ।अब आप समझ ही सकते हैं कि अपने अभीष्ट के इतने समीप होने पर भी ,विराम लेने पर कितनी बोरियत होती है ।अब भूख तो हमें थी ही नहीं ,और अगर थोड़ी बहुत थी भी तो महाराष्ट्र के वही भोजन किस्म "" बड़ा पाव या मिसल पाव "" ,जिस से हम पूरी तरह अब चुके थे ,इस लिए प्रतीक्षा करने के सिवाय हमारे पास और कोई चारा ही नही था ।तभी हमारी दृष्टि एक ऐसे व्यक्ति पर पड़ी जो गले में भारतीय रेलवे के आई कार्ड को टांगे हुए भोजन कर रहा था । परली से यहां तक की यात्रा में हमने कई बार मार्ग में बोर्ड देखे थे कि " हिंगोली " इतने किलोमीटर दूर है । तब हमे स्मरण हुआ था कि जब हम ट्रेन से हैदराबाद आते हैं तो नागपुर शहर के बाद हिंगोली घाट स्टेशन भी पड़ता है ,जहां से हैदराबाद कोई  9 घंटे की दूरी पर है ,तो क्या ये वही हिंगोली है ? मेरा छोटा भाई मेरे इस विचार से सहमत नही था , अतः जब हमे वो रेलवे का कर्मचारी दिखाई दिया तो हम उससे इस संबंध में पूछे बिना नहीं रह सके ।उसके उत्तर ने हमें बता दिया था की हां ,ये वही हंगोली है और नागपुर भी यहां से कोई 2 ही घंटे दूर है तो हम दोनो भाई भी आश्चर्य में डूबे बिना नहीं रह सके कि हम एक ही दिन में अपनी इस यात्रा के दौरान हैदराबाद से जिसकी ,नागपुर से दूरी करीब 11 घंटे से अधिक है ,इतने दूर आ चुके हैं ! 

       जैसे ही हम ,बहु प्रतीक्षित ,ज्योर्तिलिंग "" औंधा नागनाथ " के दर्शनों के लिए इस स्थान पर उतरे तो पता लगा कि इस छोटे से शहर का नाम भी औंधा नागनाथ ही है ।

     एक दम छोटा कच्चा सा गंदा सा बस स्टेंड , पर हमें कोई विशेष अचरज नहीं हुआ ,क्योंकि अपनी अनेकों धार्मिक यात्राओं के दौरान मैं जानता हूं कि लगभग सभी धार्मिक स्थान और उनके बस स्टेंड पर सफाई की आशा करना व्यर्थ ही है ।लेकिन मैं इतना भी जानता हूं कि इनमे अधिकांशों के जिम्मेदार उस शहर के नागरिक या संस्थाएं नही बल्कि उन शहरों में आने वाले यात्री ही होते है ,ये मेरा पूर्ण अनुभव भी रहा है ।q

    खैर,बस स्टेंड के एक दम सामने ही एक बड़ा सा दरवाजा बना था जिस पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था "" औंधा नागनाथ ज्योतिर्लिंग "" ! 

   हम जैसे ही इस दरवाजे के नीचे से निकलते हुए मंदिर की ओर बढ़े कि ,हमारे सामने , फूल मालाओं ,पूजन सामग्री बेचने वालों एवम भिखारियों की लाइन सी लग गई ,पर उनके प्रति ,लापरवाही का अंदाज दिखाते हुए ,कोई 100 मीटर की दूरी पर दिखाई देने वाले मंदिर के और बढ़ते ही रहे ।जैसे ही मंदिर के करीब पहुंचे ,की मंदिर के चारों ओर ,तरह तरह की भोग प्रसाद ,पूजन सामग्री और लकड़ी प्लास्टिक के खिलौनों से भरी छोटी छोटी दुकानें दिखाई दी जो तरह तरह की आवाजें लगाते हुए हमें पुकार रहे थे ।उनकी आवाजों की ओर से लापरवाह हम सोच ही रहे थे कि मंदिर का प्रवेश द्वार किस ओर है कि तभी एक नौजवान से पुजारी ने हमे संबोधन किया ,"" क्या आप मंदिर में दर्शन ,पूजा करने के लिए आए है ,अगर आप चाहें तो मैं आपको सुगमता से सब करा दूंगा ।"" पंडित जी , पैसे कितने लेंगे ,"" के उत्तर में उन्होंने कहा कि अगर आप महादेव जी का अभिषेक करना चाहते है तो 1000 रुपए ,फिर हमारे 500 कहने पर वे तुरंत तैयार भी हो गए ।बोले ,पूजन सामग्री भी वो ही लायेंगे ।बस फिर क्या था हमारी स्वीकृति के बाद उन्होंने हमें अपने पीछे पीछे आने को कहा । नियत स्थान पर हमारे बैग और जूते उतरवाने के बाद ,मंदिर के प्रवेश द्वार के अंदर ले गए ।सामने था विशाल ,प्राचीन ,पत्थरों और उनसे बनी अद्भुत मूर्तियों से सुसज्जित ,अत्यंत प्राचीन मंदिर !

   हमने देखा की मंदिर के अंदर प्रवेश करने के लिए बहुत ही लंबी लाइन लगी हुई है साथ ही ये भी देखा कि ये लाइन तो आगे बढ़ ही नही रही है ।सामने खड़े पुजारी से जब हमने पूछा की क्या दर्शन बंद है तो उन्होंने कहा कि क्योंकि इस मंदिर के गर्भ गृह के ठीक नीचे एक और गर्भ गृह है जहां महादेव का शिवलिंग स्थापित है ,वो गर्भ गृह बहुत ही छोटा है ,ओर उसमे जाने के लिए सीढी के स्थान पर एक छोटा सा आला बना हुआ है जिसमे से प्रत्येक यात्री को ,मंदिर से नियुक्त दो सेवार्थी ,उन्हें पकड़ कर नीचे उतारते हैं और दर्शन के बाद उन्हें ऊपर खींचते हैं इसी लिए दर्शनार्थियों की लाइन धीरे धीरे ही बढ़ रही है ।

आप ऐसा करें 200 रुपए की विशेष दर्शन की टिकट ले लें ,जिससे आपको इस लाइन में नही लगना पड़ेगा और आप आधे घंटे में ही दर्शन कर लेंगे ,नही तो 4 से 5 घंटे लगेंगे । हमने ये टिकट लेने में जरा भी देर नहीं लगाई क्योंकि हम चाह रहे थे की आज रात ही हम ये यात्रा कर के वापस हैदराबाद की ट्रेन पकड़ लें ताकि कल सुबह तक वहां पहुंच जाएं ।

     स्पेशल टिकट के कारण हम बीस मिनट में ही मंदिर के प्रवेश द्वार तक पहुंच गए । स्पष्ट दिख रहा था कि ये मंदिर अत्यंत ही प्राचीन है ।उसकी निर्माण शैली ,बड़े बड़े पत्थरों से निर्मित भवन इसकी गवाही दे रहे थे ।गर्म मौसम होने के कारण एवम ,लाइनों में ,एक के पीछे एक खड़े होने के कारण होने वाली बैचेनी को ,मंदिर में लगे कुछ पंखे अपनी पूरी  कोशिशों में से  कुछ ही सफलता प्राप्त कर  पा रहे थे !  वो तो कुछ भक्ति ,कुछ श्रद्धा और कुछ हर हर महादेव के नारे हमें इन सब परेशानियों से उबार से रहे थे ।

  इसी तरह की भीड़ में धकियाते से हम आगे बढ़ते रहे ,हमारे साथ ही हमारे पुजारी जी भी थे ,जिनसे कुछ सांतत्वना और कुछ मंदिर के इतिहास के बारे की जानकारी जो वे हमें दे रहे थे ,कुछ तसल्ली मिल रही थी । इतिहास के बारे में उन्होंने कहा कि इस मंदिर का गर्भ गृह ,असल में एक धरती के अंदर छोटी सी गुफा है ,जिसके एक और ऐसी प्राकृतिक रचना बनी हुई है जैसे की स्वयं शेषनाग ,महादेव की पिंडी के ऊपर अपने फैन फैलाए हुए हैं ।इस मंदिर और इसकी गुफा की खोज स्वयं पांडवों ने अपने वनवास के समय की थी । कालांतर में मुस्लिम अक्रांता औरंगजेब ने इस मंदिर को नष्ट करने की पूरी कोशिश की थी परन्तु वो अपने पूरे सामर्थ्य लगाने के बावजूद ,मंदिर के ऊपरी हिस्से को ही नष्ट कर पाया था ,जिसे महारानी अहिल्याबाई ने अपने पूर्ण सामर्थ्य से ,पुनर निर्माण करवाया था । इसी लिए आपने देखा होगा कि बाहर से देखने पर ये मंदिर ,शिखर से लेकर ,दिवालों की आधी ऊंचाई तक साधारण रूप से निर्मित है और जिस पर सफेदी पुती हुई है ,लेकिन दिवालो के नीचे ,गर्भ गृह पूरी तरह से प्राचीन पत्थरों से ही निर्मित है , उस पर सफेदी नही पुती है ।हम बड़े ही धैर्य के साथ उसकी बातें सुनते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे कि सामने मंदिर का प्रवेश द्वार दिखाई दिया ।

इस प्रवेश द्वार के सामने एक बड़ा हाल था ,जिसके भी ठीक मध्य में कछुए की विशाल प्रतिकृति बनी हुई थी ,उसके सामने ही प्राचीन पत्थर से ही निर्मित नंदी की मूर्ति बनी हुई थी ।हमने सोचा चलो अब महादेव जी के दर्शन होंगे ,पर यह क्या ,जैसे ही द्वार से अंदर घुसे ,सामने एक छोटी सी यज्ञशाला थी ।

उसके एक किनारे पर पत्थरों से निर्मित ,2 गुना 2 फुट की चौड़ाई ,लंबाई वाला एक छेद सा था ,जिसके किनारे खड़े दो हट्टे कट्टे मंदिर के सेवक ,एक एक करके यात्रियों के कंधे से उठा कर नीचे उतारते थे एवम नीचे से आने वाले यात्रियों को कंधे से ही पकड़ कर ऊपर ,बाहर निकाल रहे थे

।यात्रियों में बच्चे ,बड़े बूढ़े एवम महिलाएं थी ,स्पष्ट दिख रहा था की इन सेवकों के बिना ना तो नीचे ही उतर सकते थे और ना ही ऊपर आ सकते थे ।इसी लिए मंदिर के दर्शनार्थियों को दर्शन में इतना अधिक समय लग रहा था !  मैं लगभग भारत के सभी प्रमुख मंदिरों , और ज्योतिर्लिंगों के दर्शन कर चुका हूं परंतु दर्शनों की ऐसी व्यवस्था में पहली ही बार देख रहा था । मेरा , ऐसे गर्भ गृह में महादेव जी के दर्शनों की उत्कंठा बढ़ती ही जा रही थी , कि तभी हमारा नंबर भी नीचे उतरने का आ गया ।जैसे ही किनारे पहुंच ,हमने नीचे देखा ,और सोचते की नीचे कैसे उतरें,तभी बगल में खड़े हष्ट पुष्ट सेवकों ने मेरा कंधा दोनो ओर से पकड़ा और सीधे नीचे उतार दिया ।

     नीचे उतर, जो दृश्य देखा वो इतना अद्भुत और अनोखा था कि आज भी मेरी स्मृतियों में वो छपा हुआ है ।सामने एक 5 फुट की ऊंचाई वाला गर्भ गृह था ,जिसके ठीक मध्य में विशाल शिव लिंग स्थापित था ।इस शिवलिंग के चारों ओर एक फुट के व्यास की जलहरी बनी हुई थी ।इस के चारों ओर सिर्फ 2 फुट शेष जगह थी ,जिसके चारों ओर ,एक फुट में तो पुजारी बैठे पूजा करा रहे थे तो दूसरे खाली एक फुट की जगह में दर्शनार्थी बैठे हुए ,अभिषेक करा रहे थे ।जो यात्री अभिषेक नही करा रहे थे वे शिवलिंग के सामने ही दर्शन कर ,पूजन सामग्री अर्पित कर ,दो या तीन मिनट में ही वापस ऊपर खींच लिए जाते थे ।

अब चूंकि हमने अभिषेक के लिए कहा था तो हम एक किनारे खड़े से हो गए।खड़े क्या हो गए बल्कि पूरी कमर झुका कर ही खड़े हो पा रहे थे।

     कुछ ही समय बाद जैसे ही शिवलिंग के सामने से पहले अभिषेक करवा रहे यात्री वापस जाने के लिए उठे ,हम तुरंत ही उनके स्थान पर जाने को बढ़े ,पर यह क्या ,गर्भ गृह की ऊंचाई बहुत ही कम होने के कारण हम घुटने के बल चल कर ही शिवलिंग के सामने जा पाए और बहुत ही कम जगह होने के कारण ,पूजा करा रहे पुजारियों के साथ बड़ी ही कठिनाई से   "" फिट "" हो पाए ।

    इस अद्भुत मंदिर में ,इस अद्भुत ज्योतिर्लिंग के स्थान पर , हमें ये संतोष करने का बड़ा ही कारण यह रहा कि इस स्थान पर ,शिवलिंग के एक दम सामने हमारे पुजारी जी ने बड़े ही श्रद्धा एवम पूर्णता के साथ ,हमसे महादेव जी का अभिषेक कराया । हर वो विधि उन्होंने हमसे कराई जिनके बारे में हम जानते थे । अभिषेक के पश्चात गर्भ गृह से बाहर आने के बाद भी उन्होंने हमसे एक और पूजा पारिवारिक मंगल और सकुशल यात्रा के लिए भी  कराई ।

      पुजारी जी को धन्यवाद दे कर जब हम बाहर आए तो तब पता चला कि हमारा पेट ,हमारी पीठ से चिपका हुआ है ।अरे सुबह से शाम के 5 बज गए ,पूजा में व्यस्त होने के कारण ,भोजन के प्रति हमारा ध्यान ही नही गया ।धीरे धीरे मंदिर के बाहर आते जब हमें सामने कुछ नाश्ते भोजन की दुकानें दिखाई दी तो ,भूख और थकान मिटाने को हम उनमें से एक में घुस ही गए ।

    अब जैसे की मैने पहले बताया था ,अभी भोजन का समय नहीं होने से ,होटलों में भोजन तैयार होने में दो घंटे और थे ,तो सोचा ,चलो नाश्ता ही करें ,मगर फिर वही ,बड़ा पाव या मिसल पाव ,जिसको खाने को हम कतई तैयारनाही थे तो ,मजबूरी वश देखा की सामने का एक भोजनालय ,कढ़ाई में छोटी छोटी  कंचे के आकार की मूंग की दाल की पकौड़ी तल रहा है ,हम तुरंत ही उसके पास जा पहुंचे और दो प्लेट पकोड़े और चाय का ऑर्डर दिया । तभी दुकानदार ने कटोरी में बेसन की कढ़ी ला कर सामने रख दी ।हमने कहा ,अरे हमने तो पकोड़े और चाय के लिए कहा है तो वो बोला ,पकोड़े के साथ कढ़ी दी जाती है ,हम हैरान ! तभी समीप बैठे एक यात्री ने हमें महाराष्ट्र के बाहर का जन कर हमारा ज्ञान वर्धन किया कि पूरे महाराष्ट्र में पकोड़े ,कढ़ी के साथ ही खाते है ,साथ ही बताया कि ये पकोड़े सिर्फ मूंग दाल के नही है बल्कि दाल के साथ उसमे लहसुन और बंद गोभी को बारीक बारीक काट कर ,मिला कर पकोड़े बनाते है । कुछ सोच कर ,जब हमने कढ़ी को मुंह से लगाया तो चाहे तेज भुख की बात हो ,या यात्रा की थकान हो या नया स्वाद हो ,हमने तो खाली कढ़ी के तीन चार कटोरियां ,बिना पकोड़े के ही पी गए ।विश्वास कीजिए ,आज तक उस जैसी स्वादिष्ट कढ़ी हमने घर तो क्या ,बाहर भी ,फिर नही खाई ! 

    पकोड़ों को चाय के साथ खाते खाते हमने अब वापस हैदराबाद के लिए ट्रेन ढूंढनी शुरू की ।समझ आया कि वापसी के लिए फिर 4 घंटे ,परली बैजनाथ स्टेशन ,बस द्वारा फिर वहां से ट्रेन पकड़ कर ,सीधे हैदराबाद ।जब वहां से ट्रेन तलाश की तो पता लगा ,वहां से हैदराबाद की कोई भी ट्रेन सुबह 5 बजे से पहले की अब नही है ,तो इसका अर्थ हम शाम तक ही हैदराबाद पहुंच पाएंगे ये तो बड़ा ही लंबा सफर हो जायेगा । अब गुगल को खोल कर हम कोई अन्य उपाय देख ही रहे थे कि पता चला ,,औंधा नागनाथ से " नांदेड़ " शहर , बस से केवल 1 घंटे , अर्थात ,60 किलोमीटर ही दूर है ,यानी अभी बजे थे 6 ,तो 7 बजे तक हम नांदेड़ पहुंच जायेंगे ! नांदेड़ से ठीक रात के 11 बजे ,हैदराबाद की ट्रेन भी वहीं से बन कर चलती है जो सुबह 5 बजे हैदराबाद उतर देगी ! ,वाह ! ये रास्ता  हमें पहले क्यों नहीं सूझा था ,जिस के कारण हम वापसी के लिए परेशान थे ।तुरंत रात 11 बजे वाली ट्रेन में रिजर्वेशन ढूंढा तो वो भी मिल गया था । चलो ये तो बहुत ही बेहतर रहा । 2 ज्योर्तिलिंग के दर्शन के साथ साथ , गुरुओं की पवित्र नगरी ,"" नांदेड़ "" साहब की नगरी भी इसी बहाने घूम लेंगे ,साथ ही पवित्र गुरुद्वारे साहब के दर्शन भी हो जायेंगे !  तुरंत उठे ,सामने ही औंधा का बस स्टेंड था ही ,तो जा पहुंचे ,नांदेड़ जाने के लिए बस की तलाश में !

    बस स्टेंड पर पता लगा की नांदेड़ साहब की बस रात 9 बजे जायेगी ।हम तो परेशान हो गए ,इस से हमारा सारा प्रोग्राम बेकार हो रहा था ।अब क्या करें ,आखिरकार हमने बस स्टेंड प्रभारी से जोर दे कर पूछा की कोई अन्य उपाय या बस नही है जिस से हम समय पर नांदेड़ पहुंच पाएं । हमारी परेशानी सुनकर,और शायद हमारी भाषा मराठी की जगह हिंदी बोलते देख ,अहसान सा दिखाते हुए  ,इंचार्ज बोले तो आप एक काम करें ,आप वो सामने खड़ी बस में बैठ कर ,यहां से 25 किलोमीटर यानी आधे घंटे का सफर कर के "" बसमत "" नाम के शहर में चले जाएं वहां से लगातार ,नांदेड़ के लिए बस जाती रहती है ।धन्यवाद दे कर हम तुरंत सामने वाली बस में जा बैठे।

    आधे घंटे बाद ही बस ने , बसमत नाम के शहर में पहुंचा दिया ।शहर काफी बड़ा लगा हमे ,लेकिन बस स्टेंड ,वही पुराना स्टाइल का ।पूछने पर पता लगा की बस तो हर  15 या 20 मिनट बाद नांदेड़ के लिए जाती रहती है । हम अभी कुछ सोच पाते कि एक बस आ भी गई ,वो पहले से ही भरी थी ,ऊपर से बसमत से भी चढ़ने वाले बहुत थे ,सारी सीटें ,हमारे चढ़ने से पहले ही भर गई तो ,हमारी हिम्मत ही नहीं हुई कि  हम खड़े हो कर आगे की यात्रा करें ,क्योंकि कल ट्रेन से आने पर ,यात्रा के समय नींद भी ढंग से नहीं आई थी ,साथ ही सुबह से अभी तक हम लगातार घूम रहे थे ,चल रहे थे !

    बस हमारे सामने ही चली गई ।इंतजार के अलावा कोई चारा नहीं था कि अचानक तीन चार ओटो वालों ने हमें घेर लिया ,"" क्या आप नांदेड़ जायेंगे ,हां ,तो चलिए हम आपको नांदेड़ ले चलते है ,वो भी बस के ही कराए में ! क्या कहा ,इस ऑटो  में नांदेड़ छोड़ोगे, हमारे आश्चर्य पर ,पहले ही से बैठी  एक सवारी ने कहा ,आ  जाइए क्योंकि मैं भी इसी से नांदेड़ जा रहा हूं । हमारे इस प्रश्न पर कि इसमें तो बहुत टाइम लगेगा ,तो ऑटो वाले के उत्तर को सुन कर ,हम ,सब कुछ भाग्य पर छोड़ कर उसके ऑटो में जा बैठे , वैसे भी हमारे पास समय की बहुत कमी थी ,क्योंकि रात 11 बजे हमारी ,नांदेड़ से ,हैदराबाद की ट्रेन भी थी ! 

     दस मिनट में जैसे ही " बसमत " शहर की सीमा खत्म हुई ,सड़क थोड़ी खाली मिली ,तब उस ऑटो वाले ने जो स्पीड पकड़ी ,उससे ,हमारा सर ही नही ,पूरा शहरी ही जैसे घूमने लगा ।वास्तव में वो इतनी स्पीड से ऑटो चला रहा था ,एक बार तो हमें लगा कि कहीं हमने इसमें बैठ कर गलती तो नही की ।हम ने कस कर ऑटो को पकड़ लिया , और कई चालक से कहा की भाई हमें जल्दी तो है पर इतनी नहीं , प्लीज़ कुछ धीरे चलो ,पर

 जैसे उसके कानों में जूं तक नहीं रेंगी ! उसकी स्पीड इतनी अधिक थी कि , नांदेड़ के रास्ते में उसने दो या तीन कारों को भी ओवरटेक भी किया । लेकिन जब उसने सही सलामत हमें नांदेड़ के बस स्टेंड पर पहुंचाया ,तो ,सबसे पहले हमने ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया ,फिर सामने की बेंच पर कुछ देर बैठ कर ,तस्सली की सांस ले कर अपने को तरो ताजा किया !

    घड़ी में देखा की अभी 7 ही बजे हैं तो अब एक ही काम बचा था ,जिसके लिए हम नांदेड़ आए थे । जी हां ,नांदेड़ के प्रसिद्ध गुरुद्वारे को देखने ,जहां पर सिखों के नौंवे गुरु ,श्री गुरु तेगबहादुर जी शहीद हुए थे । दुनिया में जितने भी सिख धर्म के अनुयाई है , उनमे से प्रत्येक की ये कामना रहती है कि वे अपने जीवन में एक बार तो अपने सभी गुरुओं के  जन्म मृत्यु के साक्षी रहे ,ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन अवश्य करे , और आज मुझे भी उनकी कृपा से संयोगवश ,इन्ही नौवें गुरु श्री तेग बहादुर के शहीद ,पवित्र स्थान के दर्शन करने का सुअवसर मिला था 

      बस स्टेंड से चूंकि कुछ ही दूरी पर  पर ये गुरु द्वारा था ,इस लिए पैदल  ही बाजार की रौनक देखते देखते पंद्रह मिनट में ही हम गुरुद्वारा साहिब पहुंच गए ।गुरुवाणी की मधुर ध्वनि हमारे कानों में ही नही ,जैसे सारे आस पास के क्षेत्र में गूज रही थी । इन गुरुवाणी के गायक मेरे हिसाब से बहुत ही उच्च कोटि के गायक होते हैं इसी लिए पूरे देश के किसी भी गुरुद्वारे में जाइए , गुरुवाणी की मधुर आवाज सीधे दिल पर अपना प्रभाव छोड़ती है ।

    बहुत ही विशाल दरवाजों और ,बड़े बड़े परकोटों से जो की शुद्ध सफेद संगमरमर से निर्मित ,साथ ही शाम का अंधेरा होने के कारण रंग बिरंगी लाइटों से जगमगाता हुआ गुरुद्वारा देख हम प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके ।

     जैसे ही हम ,विशाल मुख्य दरवाजे के पास पहुंचे ,तो उसकी सुंदरता से हमारी आंखे जैसे चौंधिया सी गई ।हम चमत्कृत से उसे देख ही रहे थे कि कुछ सिख सेवादार हमारी ओर आए , हमें सर पर ओढ़ने के लिए पीले रंग का पटका दिया ,साथ ही जूते उतरने के लिए एक ओर इशारा किया । अब जैसे ही हम दरवाजे से अंदर घुसे ,सामने एक विशाल मार्ग जो झंडों से सजा हुआ था ,दर्शनार्थियों से भरा हुआ दिखाई दिया ।कोई 100 मीटर लंबे मार्ग के सामने ,एक बहुत ही ऊंचे चबूतरे पर ,सामने था "" गुरुद्वारा नांदेड़ साहब "" ! श्रद्धा से हाथ जोड़े ,कानों में गुरुवाणी के रस को घोलते ,हम भी सीधे बढ़ चले ,गुरुद्वारे के अंदर ,जहां लगातार गुरुवाणी का पाठ ही रहा था । मार्ग के अंत में जैसे ही गुरुद्वारे जाने के लिए सीढ़ियां दिखी तो उसके एक किनारे पर था ,आसमान को छूता हुआ एक खंबा जिस पर सिख धर्म का झंडा " निशान साहब " ,हल्का हल्का फहराता हुआ ,ऊपर लगी लाइट में चमकता हुआ ,एक अनोखा ही दृश्य दिखाई दे रहा था ।

जैसे ही सीढी चढ़ने के लिए पहुंचे तो नीचे देखा ,एक छोड़ी सी पानी की धार ,जिस पर पैर रख कर ही सीढी पर चढ़ पाते , पैर रखा तो एक बहुत ही सुखद अहसास हुआ ,जिसे मैं यहां शब्दों में बयान नहीं कर सकता। 

    बीस के करीब सीधी चढ़ के देखा तो सामने विशाल , चौकोर आकार की इमारत ,जिसके अंदर ठीक बीच में गुरु ग्रंथ साहब का पाठ , ग्रंथी साहब पढ़ रहे थे ।उनके चारों ओर इतने श्रद्धालु हाथ जोड़े ,आंखे मूंदे ,पाठ का श्रवण करने में लगे हुए थे ।अंदर कमरे की जगह तो छोड़िए ,इसके बाहर ,चारों ओर परिक्रमा के लिए बना ,खूब चौड़ा मार्ग भी श्रद्धालुओं से भरा हुआ था । इस मार्ग के तीन तरफ बहुत बड़े ,आंगन भी बने हुए थे जिन पर बिछी दरियों पर अनेकों अनेक श्रद्धालु ,श्रवण मनन में लगे हुए थे ।एक कौने में कुछ सिख भक्त ,गरमागरम ,अत्यंत स्वादिष्ट हलूए का प्रसाद ,प्रत्येक को बांट रहे थे । मेरे हिसाब से इस समय पूरे गुरुद्वारे में 1000 से अधिक तीर्थ यात्री उपस्थित थे ,परंतु क्या मजाल कि उनमें से किसी की भी  आवाज सुनाई दे ।

    यहां मैं अपने सुधि पाठकों को एक बात अवश्य बताना चाहूंगा कि पूरे देश का कोई भी गुरुद्वारा हो ,कितनी भी भीड़ हो ,एक दम शांत वातावरण होता है ,साथ ही दूसरी मुख्य बात कि सफाई ऐसी की क्या मजाल की और  तो सब छोड़िए  कहीं कोई फूल तक भी गिरा दिखाई दे जाए ।

        इसी भीड़ में हम भी हाथ जोड़े ,गुरुवाणी एवम गुरु के संगीत का आनंद ले रहे थे ।बीच बीच में ,श्रद्धालु जोर जोर से ,"" वाहे गुरुजी का खालसा ,वाहे गुरुजी की कृपा "" का उच्चारण करते रहते थे । इतने मंत्र मुग्ध करने वाले वातावरण में ना जाने कितनी देर तक हम डूबे रहे , कि तभी अचानक पाठ समाप्त की घोषणा हो गई और दैनिक रस्मों रिवाजों का कार्यक्रम आरंभ हो गया ।भीड़ ,बहुत ही धैर्य के साथ ,शांति के साथ मुख्य गुरुद्वारे के अंदर ,श्री गुरु ग्रंथ साहब जी के दर्शन के लिए अंदर प्रवेश करने लगी ।हम भी कुछ ही समय में मुख्य गुरु ग्रंथ साहब के सामने जब पहुंचे तो ,झुक कर उन्हे प्रणाम किया और ,मन ही मन ,इस पवित्र स्थान के दर्शन का सुअवसर देने के लिए ,उन्हे अपना आभार प्रगट किया ,फिर ,परिक्रमा देते हुए बाहर बने मार्ग पर ,वापस आ गए ।

     शाम के 8 बज चुके थे ।पूरा गुरुद्वारा परिसर तेज लाइटों से जगमगा रहा था ।गुरुद्वारे के चारो दिशाओं में चार विशाल और भव्य दरवाजे थे । ये दरवाजे आपस में एक चौकोर कोरिडोर से जुड़े हुए थे ।एक कोरिडोर के किनारे चार मंजिले कमरे यात्रियों के निवास के लिए बने थे तो एक कोरिडोर पर गुरुद्वारे के विभिन्न ऑफिस निर्मित थे ।तीसरे कोरिडोर के किनारे पर एक बहुत ही विशाल हाल बना हुआ था किस पर लिखा हुआ था ,गुरु का लंगर ।चौथे कोरिडोर पर कुछ स्टाल आदि निर्मित थे ,जिनमे से एक बड़े हिस्से पर स्वयंसेवक यात्रियों को पानी पिलाने में लगे हुए थे। मुख्य गुरुद्वारे के एक और विशाल बगीचा बना हुआ था ,जो रंग बिरंगी  लाइटों से जगमगा रहा था ।उसके ठीक बीच में एक छोटा सा तालाब था उसके अंदर लगी लाइटों से एक अद्भुत नजारा दिखा रहा था ।दूसरे किनारे पर एक पक्का खुला आंगन था जिस पर लगी बैंचों पर अनेक श्रद्धालु बेथ कर ,मन ही मन पाठ पढ़ने में लगे हुए थे । ये पूरा का पता गुरुद्वारा ,आंगन ,कोरिडोर ,कमरे आदि सब ,सफेद चमकते संगमरमर से निर्मित था ।इस खुले कोरिडोरों पर जगह जगह सिख धर्म के प्रतीक चिन्ह गुरुद्वारे से संबंधित इतिहास की जानकारी देने वाले बोर्ड  निर्मित थे। इनमे से एक पर पढ़ कर मुझे ज्ञात हुआ कि इस गुरुद्वारे के ठीक मध्य में जिस गुरुद्वारे में ,संगत ,गुरुवाणी का पाठ एवम तरह तारक के प्रवचन दे रहे थे , उस स्थान पर एक चबूतरा निर्मित था , जो गुरु तेगबहादुर जी का समाधि स्थल था , जिसके ऊपर उनकी एवम परिवार वालों की फोटो सजी हुई थी ,साथ ही रखे हुए थे ,गुरु साहिबान के अनेकों प्रकार के अस्त्र शस्त्र ।इस के सामने एक अखंड ज्योति भी शीशे के बड़े से चोकोर  पात्र में लगातार प्रज्वलित हो रही थी । इस मुख्य गुरुद्वारे के चारों ओर सिख धर्म से संबंधित कुछ चित्र भी टांगे हुए थे । और जो सबसे मुख्य आकर्षण था वो यह कि ये पूरा गुरुद्वारा ,अंदर से ले कर बाहर तक पूरे स्वर्ण से मंडित था ।रात्रि के प्रकाश में ,इस स्वर्ण मंडित दीवारों से निकलने वाली चकाचौंध एक अद्भुत आभा प्रगट कर रही थी ।

     इतना विशाल गुरुद्वारा ,पूरी तरह दर्शनार्थियों से  भरा हुआ था ।परंतु क्या मजाल कि कहीं कोई शोर शराबा या अव्यवस्था दिखाई दे ! सब के सब श्रद्धा भाव से ,शांत और प्रसन्न चित्त से ,भक्ति के सागर में डूबे हुए से थे ।हम खुद भी न जाने कितने समय तक माहौल में खोए रहे , हमें कुछ पता ही नहीं लगा ।तभी देखा की दर्शनरार्थीय लंगर भवन की ओर जाने लगे ।सिख धर्म की ये विशेष व्यवस्था जिसमे प्रत्येक यात्री ,बिना किसी भेद भाव ,अमीर हो या गरीब एक समान ,एक साथ बैठ कर लंगर यानी भोजन के लिए बैठते है ।तो हम भी उस ओर, यानी गुरु के प्रसाद " भोजन " के लिए भवन की ओर चल पड़े ।लंगर भवन के बाहर ,ही स्वयं सेवक प्रत्येक यात्री को ,भोजन की थाली ,एक चम्मच ,ओर एक कटोरी बड़े ही आदर भावसे देने में लगे हुए थे।हमने भी ये सब ले कर अंदर प्रवेश किया तो हैरान रह गए ।थोड़ी थोड़ी दूरी पर ,समानतर बिछी दरियों पर बैठते जा रहे थे ।उनके बैठते ही ,स्वयंसेवक बड़े बड़े पात्रों में अनेकों प्रकार के भोजन , जैसे कि रोटी ,चावल , दाल ,ओर मीठे में खीर ,एक के बाद एक यात्री को अनुरोध पूर्वक खिला रहे थे ।यात्री भोजन कर के जैसे ही उठते ,अपने बर्तन उठाते ,उनकी जगह दूसरे यात्री भोजन के लिए बैठ जाते ।ये प्रक्रिया लगातार चल रही थी ।मजाल कि किसी यात्री को भोजन के लिए कहना पड़े ।स्वयं सेवक, एक के बाद एक ,लगातार उनकी आवश्यकतानुसार भोजन सामग्री ,बिना किसी विलंब के उन्हे परोस रहे थे ।पूरे हाल में तकरीबन 500 से अधिक यात्री ,लगातार भोजन, एक के बाद एक , कर रहे थे परन्तु कोई आवाज नहीं ।पूर्ण शांति ।ये भी मेरे लिए पहली ही बार एक अपूर्व संस्मरण था ।

    भोजन के बाद हमारे झूठे पात्र ,तुरंत ही एक लाइन में खड़े स्वयंसेवक ,आग्रह पूर्वक हमसे लेते जा रहे थे ,ओर शांति से उन्हें फिर से एक बार परोसने के लिए ,मांजते भी जा रहे थे । उत्सुकता पूर्वक ,जब मैने एक स्वयं सेवक से ,इस लंगर की व्यवस्था के बारे में जानना चाहा तो मुझे उत्तर मिला , उस से मेरा सर श्रद्धा से इन सब के लिए झुक गया ।उसके अनुसार भोजन निर्माण ,परोसने से लेकर सारे कार्य ,प्रत्येक सिख ,गुरु की आज्ञा के अनुसार ,अपनी इच्छा से ,बिना किसी मूल्य के ,अपनी सामर्थ्य के अनुसार कार्य है और अपने को , ऐसी सेवा कर ,धन्य मान कर ,गुरु की सेवा का सुअवसर मानता है ।विश्वास कीजिए ,आज से पहले ,मैने किसी भी धर्म में , ऐसी सेवा का रूप कहीं नहीं देखी । उनके अनुसार सिख धर्म की पहली सिख यही है कि भूखे को भोजन पूरी श्रद्धा से कराएं ।धन्य है ऐसी सेवा और ऐसी सेवा करने वाले !

    अपने को धन्य मानते हुए कि एक ही दिन में , हमें महाराष्ट्र के दो, अनजान,अनायास ,ज्योर्तिलिंग के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ,वहीं सिखों के महान गुरु श्री तेगबहादूर जी के पवित्र स्थल ,महाराष्ट्र के प्रसिद्ध शहर " नांदेड़ " में स्थित श्री नांदेड़ साहब ,गुरुद्वारे के दर्शन का सुअवसर भी मिला ।

     घड़ी देखी ,रात्रि के साढ़े दस बजे थे ,बाजार अभी भी खुले हुए थे तो हमने यही सोचा कि स्टेशन ,जो की यहां से सिर्फ पंद्रह मिनट की पैदल दूरी पर है ,तो बाजार की रौनक देखते हुए चलेंगे ।

    नांदेड़ स्टेशन पर हमारी ट्रेन , हमें  हैदराबाद ले जाने के लिए ,जैसे हमारी ही प्रतीक्षा कर रही थी ,क्योंकि जैसे ही हम अपने डिब्बे में घुसे ,अपनी रिजर्व सीट पर लेटे ही थे कि ट्रेन हमारी मंजिल की ओर रवाना हो गई ,तो हम भी दिन भर की थकान के कारण तुरंत ही सपनों की यात्रा पर निकल गए !

                            ( समाप्त )

बुधवार, 20 अगस्त 2025

यात्रा ....... औंधा नागनाथ ज्योतिर्लिंग

         सुबह 11 बजे से महाराष्ट्र सरकार की बस से लगातार चलते हुए ,लगभग दोपहर के 3 बजे के करीब जब हम औंधा नाग नाथ पहुंचने ही वाले थे कि एक ढाबे पर बस रूकी। कंडकतर महोदय ने उच्च स्वर में घोषणा की कि 15 मिनट के विराम में आप भोजन आदि कर सकते हैं ।बस से उतरने के बाद जब हमने पूछा की अब औंधा नागनाथ कितनी दूर है तो उत्तर मिला ,पास में ही कोई 2 किलोमीटर ।अब आप समझ ही सकते हैं कि अपने अभीष्ट के इतने समीप होने पर भी ,विराम लेने पर कितनी बोरियत होती है ।अब भूख तो हमें थी ही नहीं ,और अगर थोड़ी बहुत थी भी तो महाराष्ट्र के वही भोजन किस्म "" बड़ा पाव या मिसल पाव "" ,जिस से हम पूरी तरह अब चुके थे ,इस लिए प्रतीक्षा करने के सिवाय हमारे पास और कोई चारा ही नही था ।तभी हमारी दृष्टि एक ऐसे व्यक्ति पर पड़ी जो गले में भारतीय रेलवे के आई कार्ड को टांगे हुए भोजन कर रहा था । परली से यहां तक की यात्रा में हमने कई बार मार्ग में बोर्ड देखे थे कि " हिंगोली " इतने किलोमीटर दूर है । तब हमे स्मरण हुआ था कि जब हम ट्रेन से हैदराबाद आते हैं तो नागपुर शहर के बाद हिंगोली घाट स्टेशन भी पड़ता है ,जहां से हैदराबाद कोई  9 घंटे की दूरी पर है ,तो क्या ये वही हिंगोली है ? मेरा छोटा भाई मेरे इस विचार से सहमत नही था , अतः जब हमे वो रेलवे का कर्मचारी दिखाई दिया तो हम उससे इस संबंध में पूछे बिना नहीं रह सके ।उसके उत्तर ने हमें बता दिया था की हां ,ये वही हंगोली है और नागपुर भी यहां से कोई 2 ही घंटे दूर है तो हम दोनो भाई भी आश्चर्य में डूबे बिना नहीं रह सके कि हम एक ही दिन में अपनी इस यात्रा के दौरान हैदराबाद से जिसकी ,नागपुर से दूरी करीब 11 घंटे से अधिक है ,इतने दूर आ चुके हैं ! 
       जैसे ही हम ,बहु प्रतीक्षित ,ज्योर्तिलिंग "" औंधा नागनाथ " के दर्शनों के लिए इस स्थान पर उतरे तो पता लगा कि इस छोटे से शहर का नाम भी औंधा नागनाथ ही है ।
     एक दम छोटा कच्चा सा गंदा सा बस स्टेंड , पर हमें कोई विशेष अचरज नहीं हुआ ,क्योंकि अपनी अनेकों धार्मिक यात्राओं के दौरान मैं जानता हूं कि लगभग सभी धार्मिक स्थान और उनके बस स्टेंड पर सफाई की आशा करना व्यर्थ ही है ।लेकिन मैं इतना भी जानता हूं कि इनमे अधिकांशों के जिम्मेदार उस शहर के नागरिक या संस्थाएं नही बल्कि उन शहरों में आने वाले यात्री ही होते है ,ये मेरा पूर्ण अनुभव भी रहा है ।q
    खैर,बस स्टेंड के एक दम सामने ही एक बड़ा सा दरवाजा बना था जिस पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था "" औंधा नागनाथ ज्योतिर्लिंग "" ! 
   हम जैसे ही इस दरवाजे के नीचे से निकलते हुए मंदिर की ओर बढ़े कि ,हमारे सामने , फूल मालाओं ,पूजन सामग्री बेचने वालों एवम भिखारियों की लाइन सी लग गई ,पर उनके प्रति ,लापरवाही का अंदाज दिखाते हुए ,कोई 100 मीटर की दूरी पर दिखाई देने वाले मंदिर के और बढ़ते ही रहे ।जैसे ही मंदिर के करीब पहुंचे ,की मंदिर के चारों ओर ,तरह तरह की भोग प्रसाद ,पूजन सामग्री और लकड़ी प्लास्टिक के खिलौनों से भरी छोटी छोटी दुकानें दिखाई दी जो तरह तरह की आवाजें लगाते हुए हमें पुकार रहे थे ।उनकी आवाजों की ओर से लापरवाह हम सोच ही रहे थे कि मंदिर का प्रवेश द्वार किस ओर है कि तभी एक नौजवान से पुजारी ने हमे संबोधन किया ,"" क्या आप मंदिर में दर्शन ,पूजा करने के लिए आए है ,अगर आप चाहें तो मैं आपको सुगमता से सब करा दूंगा ।"" पंडित जी , पैसे कितने लेंगे ,"" के उत्तर में उन्होंने कहा कि अगर आप महादेव जी का अभिषेक करना चाहते है तो 1000 रुपए ,फिर हमारे 500 कहने पर वे तुरंत तैयार भी हो गए ।बोले ,पूजन सामग्री भी वो ही लायेंगे ।बस फिर क्या था हमारी स्वीकृति के बाद उन्होंने हमें अपने पीछे पीछे आने को कहा । नियत स्थान पर हमारे बैग और जूते उतरवाने के बाद ,मंदिर के प्रवेश द्वार के अंदर ले गए ।सामने था विशाल ,प्राचीन ,पत्थरों और उनसे बनी अद्भुत मूर्तियों से सुसज्जित ,अत्यंत प्राचीन मंदिर !
   हमने देखा की मंदिर के अंदर प्रवेश करने के लिए बहुत ही लंबी लाइन लगी हुई है साथ ही ये भी देखा कि ये लाइन तो आगे बढ़ ही नही रही है ।सामने खड़े पुजारी से जब हमने पूछा की क्या दर्शन बंद है तो उन्होंने कहा कि क्योंकि इस मंदिर के गर्भ गृह के ठीक नीचे एक और गर्भ गृह है जहां महादेव का शिवलिंग स्थापित है ,वो गर्भ गृह बहुत ही छोटा है ,ओर उसमे जाने के लिए सीढी के स्थान पर एक छोटा सा आला बना हुआ है जिसमे से प्रत्येक यात्री को ,मंदिर से नियुक्त दो सेवार्थी ,उन्हें पकड़ कर नीचे उतारते हैं और दर्शन के बाद उन्हें ऊपर खींचते हैं इसी लिए दर्शनार्थियों की लाइन धीरे धीरे ही बढ़ रही है ।आप ऐसा करें 200 रुपए की विशेष दर्शन की टिकट ले लें ,जिससे आपको इस लाइन में नही लगना पड़ेगा और आप आधे घंटे में ही दर्शन कर लेंगे ,नही तो 4 से 5 घंटे लगेंगे । हमने ये टिकट लेने में जरा भी देर नहीं लगाई क्योंकि हम चाह रहे थे की आज रात ही हम ये यात्रा कर के वापस हैदराबाद की ट्रेन पकड़ लें ताकि कल सुबह तक वहां पहुंच जाएं ।
     स्पेशल टिकट के कारण हम बीस मिनट में ही मंदिर के प्रवेश द्वार तक पहुंच गए । स्पष्ट दिख रहा था कि ये मंदिर अत्यंत ही प्राचीन है ।उसकी निर्माण शैली ,बड़े बड़े पत्थरों से निर्मित भवन इसकी गवाही दे रहे थे ।गर्म मौसम होने के कारण एवम ,लाइनों में ,एक के पीछे एक खड़े होने के कारण होने वाली बैचेनी को ,मंदिर में लगे कुछ पंखे अपनी पूरी  कोशिशों में से  कुछ ही सफलता प्राप्त कर  पा रहे थे !  वो तो कुछ भक्ति ,कुछ श्रद्धा और कुछ हर हर महादेव के नारे हमें इन सब परेशानियों से उबार से रहे थे ।
  इसी तरह की भीड़ में धकियाते से हम आगे बढ़ते रहे ,हमारे साथ ही हमारे पुजारी जी भी थे ,जिनसे कुछ सांतत्वना और कुछ मंदिर के इतिहास के बारे की जानकारी जो वे हमें दे रहे थे ,कुछ तसल्ली मिल रही थी । इतिहास के बारे में उन्होंने कहा कि इस मंदिर का गर्भ गृह ,असल में एक धरती के अंदर छोटी सी गुफा है ,जिसके एक और ऐसी प्राकृतिक रचना बनी हुई है जैसे की स्वयं शेषनाग ,महादेव की पिंडी के ऊपर अपने फैन फैलाए हुए हैं ।इस मंदिर और इसकी गुफा की खोज स्वयं पांडवों ने अपने वनवास के समय की थी । कालांतर में मुस्लिम अक्रांता औरंगजेब ने इस मंदिर को नष्ट करने की पूरी कोशिश की थी परन्तु वो अपने पूरे सामर्थ्य लगाने के बावजूद ,मंदिर के ऊपरी हिस्से को ही नष्ट कर पाया था ,जिसे महारानी अहिल्याबाई ने अपने पूर्ण सामर्थ्य से ,पुनर निर्माण करवाया था । इसी लिए आपने देखा होगा कि बाहर से देखने पर ये मंदिर ,शिखर से लेकर ,दिवालों की आधी ऊंचाई तक साधारण रूप से निर्मित है और जिस पर सफेदी पुती हुई है ,लेकिन दिवालो के नीचे ,गर्भ गृह पूरी तरह से प्राचीन पत्थरों से ही निर्मित है , उस पर सफेदी नही पुती है ।हम बड़े ही धैर्य के साथ उसकी बातें सुनते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे कि सामने मंदिर का प्रवेश द्वार दिखाई दिया । इस प्रवेश द्वार के सामने एक बड़ा हाल था ,जिसके भी ठीक मध्य में कछुए की विशाल प्रतिकृति बनी हुई थी ,उसके सामने ही प्राचीन पत्थर से ही निर्मित नंदी की मूर्ति बनी हुई थी ।हमने सोचा चलो अब महादेव जी के दर्शन होंगे ,पर यह क्या ,जैसे ही द्वार से अंदर घुसे ,सामने एक छोटी सी यज्ञशाला थी ।उसके एक किनारे पर पत्थरों से निर्मित ,2 गुना 2 फुट की चौड़ाई ,लंबाई वाला एक छेद सा था ,जिसके किनारे खड़े दो हट्टे कट्टे मंदिर के सेवक ,एक एक करके यात्रियों के कंधे से उठा कर नीचे उतारते थे एवम नीचे से आने वाले यात्रियों को कंधे से ही पकड़ कर ऊपर ,बाहर निकाल रहे थे ।यात्रियों में बच्चे ,बड़े बूढ़े एवम महिलाएं थी ,स्पष्ट दिख रहा था की इन सेवकों के बिना ना तो नीचे ही उतर सकते थे और ना ही ऊपर आ सकते थे ।इसी लिए मंदिर के दर्शनार्थियों को दर्शन में इतना अधिक समय लग रहा था !  मैं लगभग भारत के सभी प्रमुख मंदिरों , और ज्योतिर्लिंगों के दर्शन कर चुका हूं परंतु दर्शनों की ऐसी व्यवस्था में पहली ही बार देख रहा था । मेरा , ऐसे गर्भ गृह में महादेव जी के दर्शनों की उत्कंठा बढ़ती ही जा रही थी , कि तभी हमारा नंबर भी नीचे उतरने का आ गया ।जैसे ही किनारे पहुंच ,हमने नीचे देखा ,और सोचते की नीचे कैसे उतरें,तभी बगल में खड़े हष्ट पुष्ट सेवकों ने मेरा कंधा दोनो ओर से पकड़ा और सीधे नीचे उतार दिया ।
     नीचे उतर, जो दृश्य देखा वो इतना अद्भुत और अनोखा था कि आज भी मेरी स्मृतियों में वो छपा हुआ है ।सामने एक 5 फुट की ऊंचाई वाला गर्भ गृह था ,जिसके ठीक मध्य में विशाल शिव लिंग स्थापित था ।इस शिवलिंग के चारों ओर एक फुट के व्यास की जलहरी बनी हुई थी ।इस के चारों ओर सिर्फ 2 फुट शेष जगह थी ,जिसके चारों ओर ,एक फुट में तो पुजारी बैठे पूजा करा रहे थे तो दूसरे खाली एक फुट की जगह में दर्शनार्थी बैठे हुए ,अभिषेक करा रहे थे ।जो यात्री अभिषेक नही करा रहे थे वे शिवलिंग के सामने ही दर्शन कर ,पूजन सामग्री अर्पित कर ,दो या तीन मिनट में ही वापस ऊपर खींच लिए जाते थे ।अब चूंकि हमने अभिषेक के लिए कहा था तो हम एक किनारे खड़े से हो गए।खड़े क्या हो गए बल्कि पूरी कमर झुका कर ही खड़े हो पा रहे थे।
     कुछ ही समय बाद जैसे ही शिवलिंग के सामने से पहले अभिषेक करवा रहे यात्री वापस जाने के लिए उठे ,हम तुरंत ही उनके स्थान पर जाने को बढ़े ,पर यह क्या ,गर्भ गृह की ऊंचाई बहुत ही कम होने के कारण हम घुटने के बल चल कर ही शिवलिंग के सामने जा पाए और बहुत ही कम जगह होने के कारण ,पूजा करा रहे पुजारियों के साथ बड़ी ही कठिनाई से   "" फिट "" हो पाए ।
    इस अद्भुत मंदिर में ,इस अद्भुत ज्योतिर्लिंग के स्थान पर , हमें ये संतोष करने का बड़ा ही कारण यह रहा कि इस स्थान पर ,शिवलिंग के एक दम सामने हमारे पुजारी जी ने बड़े ही श्रद्धा एवम पूर्णता के साथ ,हमसे महादेव जी का अभिषेक कराया । हर वो विधि उन्होंने हमसे कराई जिनके बारे में हम जानते थे । अभिषेक के पश्चात गर्भ गृह से बाहर आने के बाद भी उन्होंने हमसे एक और पूजा पारिवारिक मंगल और सकुशल यात्रा के लिए भी  कराई ।
      पुजारी जी को धन्यवाद दे कर जब हम बाहर आए तो तब पता चला कि हमारा पेट ,हमारी पीठ से चिपका हुआ है ।अरे सुबह से शाम के 5 बज गए ,पूजा में व्यस्त होने के कारण ,भोजन के प्रति हमारा ध्यान ही नही गया ।धीरे धीरे मंदिर के बाहर आते जब हमें सामने कुछ नाश्ते भोजन की दुकानें दिखाई दी तो ,भूख और थकान मिटाने को हम उनमें से एक में घुस ही गए ।
    अब जैसे की मैने पहले बताया था ,अभी भोजन का समय नहीं होने से ,होटलों में भोजन तैयार होने में दो घंटे और थे ,तो सोचा ,चलो नाश्ता ही करें ,मगर फिर वही ,बड़ा पाव या मिसल पाव ,जिसको खाने को हम कतई तैयारनाही थे तो ,मजबूरी वश देखा की सामने का एक भोजनालय ,कढ़ाई में छोटी छोटी  कंचे के आकार की मूंग की दाल की पकौड़ी तल रहा है ,हम तुरंत ही उसके पास जा पहुंचे और दो प्लेट पकोड़े और चाय का ऑर्डर दिया । तभी दुकानदार ने कटोरी में बेसन की कढ़ी ला कर सामने रख दी ।हमने कहा ,अरे हमने तो पकोड़े और चाय के लिए कहा है तो वो बोला ,पकोड़े के साथ कढ़ी दी जाती है ,हम हैरान ! तभी समीप बैठे एक यात्री ने हमें महाराष्ट्र के बाहर का जन कर हमारा ज्ञान वर्धन किया कि पूरे महाराष्ट्र में पकोड़े ,कढ़ी के साथ ही खाते है ,साथ ही बताया कि ये पकोड़े सिर्फ मूंग दाल के नही है बल्कि दाल के साथ उसमे लहसुन और बंद गोभी को बारीक बारीक काट कर ,मिला कर पकोड़े बनाते है । कुछ सोच कर ,जब हमने कढ़ी को मुंह से लगाया तो चाहे तेज भुख की बात हो ,या यात्रा की थकान हो या नया स्वाद हो ,हमने तो खाली कढ़ी के तीन चार कटोरियां ,बिना पकोड़े के ही पी गए ।विश्वास कीजिए ,आज तक उस जैसी स्वादिष्ट कढ़ी हमने घर तो क्या ,बाहर भी ,फिर नही खाई ! 
    पकोड़ों को चाय के साथ खाते खाते हमने अब वापस हैदराबाद के लिए ट्रेन ढूंढनी शुरू की ।समझ आया कि वापसी के लिए फिर 4 घंटे ,परली बैजनाथ स्टेशन ,बस द्वारा फिर वहां से ट्रेन पकड़ कर ,सीधे हैदराबाद ।जब वहां से ट्रेन तलाश की तो पता लगा ,वहां से हैदराबाद की कोई भी ट्रेन सुबह 5 बजे से पहले की अब नही है ,तो इसका अर्थ हम शाम तक ही हैदराबाद पहुंच पाएंगे ये तो बड़ा ही लंबा सफर हो जायेगा । अब गुगल को खोल कर हम कोई अन्य उपाय देख ही रहे थे कि पता चला ,,औंधा नागनाथ से " नांदेड़ " शहर , बस से केवल 1 घंटे , अर्थात ,60 किलोमीटर ही दूर है ,यानी अभी बजे थे 6 ,तो 7 बजे तक हम नांदेड़ पहुंच जायेंगे ! नांदेड़ से ठीक रात के 11 बजे ,हैदराबाद की ट्रेन भी वहीं से बन कर चलती है जो सुबह 5 बजे हैदराबाद उतर देगी ! ,वाह ! ये रास्ता  हमें पहले क्यों नहीं सूझा था ,जिस के कारण हम वापसी के लिए परेशान थे ।तुरंत रात 11 बजे वाली ट्रेन में रिजर्वेशन ढूंढा तो वो भी मिल गया था । चलो ये तो बहुत ही बेहतर रहा । 2 ज्योर्तिलिंग के दर्शन के साथ साथ , गुरुओं की पवित्र नगरी ,"" नांदेड़ "" साहब की नगरी भी इसी बहाने घूम लेंगे ,साथ ही पवित्र गुरुद्वारे साहब के दर्शन भी हो जायेंगे !  तुरंत उठे ,सामने ही औंधा का बस स्टेंड था ही ,तो जा पहुंचे ,नांदेड़ जाने के लिए बस की तलाश में !
    बस स्टेंड पर पता लगा की नांदेड़ साहब की बस रात 9 बजे जायेगी ।हम तो परेशान हो गए ,इस से हमारा सारा प्रोग्राम बेकार हो रहा था ।अब क्या करें ,आखिरकार हमने बस स्टेंड प्रभारी से जोर दे कर पूछा की कोई अन्य उपाय या बस नही है जिस से हम समय पर नांदेड़ पहुंच पाएं । हमारी परेशानी सुनकर,और शायद हमारी भाषा मराठी की जगह हिंदी बोलते देख ,अहसान सा दिखाते हुए  ,इंचार्ज बोले तो आप एक काम करें ,आप वो सामने खड़ी बस में बैठ कर ,यहां से 25 किलोमीटर यानी आधे घंटे का सफर कर के "" बसमत "" नाम के शहर में चले जाएं वहां से लगातार ,नांदेड़ के लिए बस जाती रहती है ।धन्यवाद दे कर हम तुरंत सामने वाली बस में जा बैठे।
    आधे घंटे बाद ही बस ने , बसमत नाम के शहर में पहुंचा दिया ।शहर काफी बड़ा लगा हमे ,लेकिन बस स्टेंड ,वही पुराना स्टाइल का ।पूछने पर पता लगा की बस तो हर  15 या 20 मिनट बाद नांदेड़ के लिए जाती रहती है । हम अभी कुछ सोच पाते कि एक बस आ भी गई ,वो पहले से ही भरी थी ,ऊपर से बसमत से भी चढ़ने वाले बहुत थे ,सारी सीटें ,हमारे चढ़ने से पहले ही भर गई तो ,हमारी हिम्मत ही नहीं हुई कि  हम खड़े हो कर आगे की यात्रा करें ,क्योंकि कल ट्रेन से आने पर ,यात्रा के समय नींद भी ढंग से नहीं आई थी ,साथ ही सुबह से अभी तक हम लगातार घूम रहे थे ,चल रहे थे !
  
    बस हमारे सामने ही चली गई ।इंतजार के अलावा कोई चारा नहीं था कि अचानक तीन चार ओटो वालों ने हमें घेर लिया ,"" क्या आप नांदेड़ जायेंगे ,हां ,तो चलिए हम आपको नांदेड़ ले चलते है ,वो भी बस के ही कराए में ! क्या कहा ,इस ऑटो  में नांदेड़ छोड़ोगे, हमारे आश्चर्य पर ,पहले ही से बैठी  एक सवारी ने कहा ,आ  जाइए क्योंकि मैं भी इसी से नांदेड़ जा रहा हूं । हमारे इस प्रश्न पर कि इसमें तो बहुत टाइम लगेगा ,तो ऑटो वाले के उत्तर को सुन कर ,हम ,सब कुछ भाग्य पर छोड़ कर उसके ऑटो में जा बैठे , वैसे भी हमारे पास समय की बहुत कमी थी ,क्योंकि रात 11 बजे हमारी ,नांदेड़ से ,हैदराबाद की ट्रेन भी थी ! 
     दस मिनट में जैसे ही " बसमत " शहर की सीमा खत्म हुई ,सड़क थोड़ी खाली मिली ,तब उस ऑटो वाले ने जो स्पीड पकड़ी ,उससे ,हमारा सर ही नही ,पूरा शहरी ही जैसे घूमने लगा ।वास्तव में वो इतनी स्पीड से ऑटो चला रहा था ,एक बार तो हमें लगा कि कहीं हमने इसमें बैठ कर गलती तो नही की ।हम ने कस कर ऑटो को पकड़ लिया , और कई चालक से कहा की भाई हमें जल्दी तो है पर इतनी नहीं , प्लीज़ कुछ धीरे चलो ,पर
 जैसे उसके कानों में जूं तक नहीं रेंगी ! उसकी स्पीड इतनी अधिक थी कि , नांदेड़ के रास्ते में उसने दो या तीन कारों को भी ओवरटेक भी किया । लेकिन जब उसने सही सलामत हमें नांदेड़ के बस स्टेंड पर पहुंचाया ,तो ,सबसे पहले हमने ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया ,फिर सामने की बेंच पर कुछ देर बैठ कर ,तस्सली की सांस ले कर अपने को तरो ताजा किया !
    घड़ी में देखा की अभी 7 ही बजे हैं तो अब एक ही काम बचा था ,जिसके लिए हम नांदेड़ आए थे । जी हां ,नांदेड़ के प्रसिद्ध गुरुद्वारे को देखने ,जहां पर सिखों के नौंवे गुरु ,श्री गुरु तेगबहादुर जी शहीद हुए थे । दुनिया में जितने भी सिख धर्म के अनुयाई है , उनमे से प्रत्येक की ये कामना रहती है कि वे अपने जीवन में एक बार तो अपने सभी गुरुओं के  जन्म मृत्यु के साक्षी रहे ,ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन अवश्य करे , और आज मुझे भी उनकी कृपा से संयोगवश ,इन्ही नौवें गुरु श्री तेग बहादुर के शहीद ,पवित्र स्थान के दर्शन करने का सुअवसर मिला था 
      बस स्टेंड से चूंकि कुछ ही दूरी पर  पर ये गुरु द्वारा था ,इस लिए पैदल  ही बाजार की रौनक देखते देखते पंद्रह मिनट में ही हम गुरुद्वारा साहिब पहुंच गए ।गुरुवाणी की मधुर ध्वनि हमारे कानों में ही नही ,जैसे सारे आस पास के क्षेत्र में गूज रही थी । इन गुरुवाणी के गायक मेरे हिसाब से बहुत ही उच्च कोटि के गायक होते हैं इसी लिए पूरे देश के किसी भी गुरुद्वारे में जाइए , गुरुवाणी की मधुर आवाज सीधे दिल पर अपना प्रभाव छोड़ती है ।
    बहुत ही विशाल दरवाजों और ,बड़े बड़े परकोटों से जो की शुद्ध सफेद संगमरमर से निर्मित ,साथ ही शाम का अंधेरा होने के कारण रंग बिरंगी लाइटों से जगमगाता हुआ गुरुद्वारा देख हम प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके ।
     जैसे ही हम ,विशाल मुख्य दरवाजे के पास पहुंचे ,तो उसकी सुंदरता से हमारी आंखे जैसे चौंधिया सी गई ।हम चमत्कृत से उसे देख ही रहे थे कि कुछ सिख सेवादार हमारी ओर आए , हमें सर पर ओढ़ने के लिए पीले रंग का पटका दिया ,साथ ही जूते उतरने के लिए एक ओर इशारा किया । अब जैसे ही हम दरवाजे से अंदर घुसे ,सामने एक विशाल मार्ग जो झंडों से सजा हुआ था ,दर्शनार्थियों से भरा हुआ दिखाई दिया ।कोई 100 मीटर लंबे मार्ग के सामने ,एक बहुत ही ऊंचे चबूतरे पर ,सामने था "" गुरुद्वारा नांदेड़ साहब "" ! श्रद्धा से हाथ जोड़े ,कानों में गुरुवाणी के रस को घोलते ,हम भी सीधे बढ़ चले ,गुरुद्वारे के अंदर ,जहां लगातार गुरुवाणी का पाठ ही रहा था । मार्ग के अंत में जैसे ही गुरुद्वारे जाने के लिए सीढ़ियां दिखी तो उसके एक किनारे पर था ,आसमान को छूता हुआ एक खंबा जिस पर सिख धर्म का झंडा " निशान साहब " ,हल्का हल्का फहराता हुआ ,ऊपर लगी लाइट में चमकता हुआ ,एक अनोखा ही दृश्य दिखाई दे रहा था ।
जैसे ही सीढी चढ़ने के लिए पहुंचे तो नीचे देखा ,एक छोड़ी सी पानी की धार ,जिस पर पैर रख कर ही सीढी पर चढ़ पाते , पैर रखा तो एक बहुत ही सुखद अहसास हुआ ,जिसे मैं यहां शब्दों में बयान नहीं कर सकता। 
    बीस के करीब सीधी चढ़ के देखा तो सामने विशाल , चौकोर आकार की इमारत ,जिसके अंदर ठीक बीच में गुरु ग्रंथ साहब का पाठ , ग्रंथी साहब पढ़ रहे थे ।उनके चारों ओर इतने श्रद्धालु हाथ जोड़े ,आंखे मूंदे ,पाठ का श्रवण करने में लगे हुए थे ।अंदर कमरे की जगह तो छोड़िए ,इसके बाहर ,चारों ओर परिक्रमा के लिए बना ,खूब चौड़ा मार्ग भी श्रद्धालुओं से भरा हुआ था । इस मार्ग के तीन तरफ बहुत बड़े ,आंगन भी बने हुए थे जिन पर बिछी दरियों पर अनेकों अनेक श्रद्धालु ,श्रवण मनन में लगे हुए थे ।एक कौने में कुछ सिख भक्त ,गरमागरम ,अत्यंत स्वादिष्ट हलूए का प्रसाद ,प्रत्येक को बांट रहे थे । मेरे हिसाब से इस समय पूरे गुरुद्वारे में 1000 से अधिक तीर्थ यात्री उपस्थित थे ,परंतु क्या मजाल कि उनमें से किसी की भी  आवाज सुनाई दे ।
    यहां मैं अपने सुधि पाठकों को एक बात अवश्य बताना चाहूंगा कि पूरे देश का कोई भी गुरुद्वारा हो ,कितनी भी भीड़ हो ,एक दम शांत वातावरण होता है ,साथ ही दूसरी मुख्य बात कि सफाई ऐसी की क्या मजाल की और  तो सब छोड़िए  कहीं कोई फूल तक भी गिरा दिखाई दे जाए ।
        इसी भीड़ में हम भी हाथ जोड़े ,गुरुवाणी एवम गुरु के संगीत का आनंद ले रहे थे ।बीच बीच में ,श्रद्धालु जोर जोर से ,"" वाहे गुरुजी का खालसा ,वाहे गुरुजी की कृपा "" का उच्चारण करते रहते थे । इतने मंत्र मुग्ध करने वाले वातावरण में ना जाने कितनी देर तक हम डूबे रहे , कि तभी अचानक पाठ समाप्त की घोषणा हो गई और दैनिक रस्मों रिवाजों का कार्यक्रम आरंभ हो गया ।भीड़ ,बहुत ही धैर्य के साथ ,शांति के साथ मुख्य गुरुद्वारे के अंदर ,श्री गुरु ग्रंथ साहब जी के दर्शन के लिए अंदर प्रवेश करने लगी ।हम भी कुछ ही समय में मुख्य गुरु ग्रंथ साहब के सामने जब पहुंचे तो ,झुक कर उन्हे प्रणाम किया और ,मन ही मन ,इस पवित्र स्थान के दर्शन का सुअवसर देने के लिए ,उन्हे अपना आभार प्रगट किया ,फिर ,परिक्रमा देते हुए बाहर बने मार्ग पर ,वापस आ गए ।
     शाम के 8 बज चुके थे ।पूरा गुरुद्वारा परिसर तेज लाइटों से जगमगा रहा था ।गुरुद्वारे के चारो दिशाओं में चार विशाल और भव्य दरवाजे थे । ये दरवाजे आपस में एक चौकोर कोरिडोर से जुड़े हुए थे ।एक कोरिडोर के किनारे चार मंजिले कमरे यात्रियों के निवास के लिए बने थे तो एक कोरिडोर पर गुरुद्वारे के विभिन्न ऑफिस निर्मित थे ।तीसरे कोरिडोर के किनारे पर एक बहुत ही विशाल हाल बना हुआ था किस पर लिखा हुआ था ,गुरु का लंगर ।चौथे कोरिडोर पर कुछ स्टाल आदि निर्मित थे ,जिनमे से एक बड़े हिस्से पर स्वयंसेवक यात्रियों को पानी पिलाने में लगे हुए थे। मुख्य गुरुद्वारे के एक और विशाल बगीचा बना हुआ था ,जो रंग बिरंगी  लाइटों से जगमगा रहा था ।उसके ठीक बीच में एक छोटा सा तालाब था उसके अंदर लगी लाइटों से एक अद्भुत नजारा दिखा रहा था ।दूसरे किनारे पर एक पक्का खुला आंगन था जिस पर लगी बैंचों पर अनेक श्रद्धालु बेथ कर ,मन ही मन पाठ पढ़ने में लगे हुए थे । ये पूरा का पता गुरुद्वारा ,आंगन ,कोरिडोर ,कमरे आदि सब ,सफेद चमकते संगमरमर से निर्मित था ।इस खुले कोरिडोरों पर जगह जगह सिख धर्म के प्रतीक चिन्ह गुरुद्वारे से संबंधित इतिहास की जानकारी देने वाले बोर्ड  निर्मित थे। इनमे से एक पर पढ़ कर मुझे ज्ञात हुआ कि इस गुरुद्वारे के ठीक मध्य में जिस गुरुद्वारे में ,संगत ,गुरुवाणी का पाठ एवम तरह तारक के प्रवचन दे रहे थे , उस स्थान पर एक चबूतरा निर्मित था , जो गुरु तेगबहादुर जी का समाधि स्थल था , जिसके ऊपर उनकी एवम परिवार वालों की फोटो सजी हुई थी ,साथ ही रखे हुए थे ,गुरु साहिबान के अनेकों प्रकार के अस्त्र शस्त्र ।इस के सामने एक अखंड ज्योति भी शीशे के बड़े से चोकोर  पात्र में लगातार प्रज्वलित हो रही थी । इस मुख्य गुरुद्वारे के चारों ओर सिख धर्म से संबंधित कुछ चित्र भी टांगे हुए थे । और जो सबसे मुख्य आकर्षण था वो यह कि ये पूरा गुरुद्वारा ,अंदर से ले कर बाहर तक पूरे स्वर्ण से मंडित था ।रात्रि के प्रकाश में ,इस स्वर्ण मंडित दीवारों से निकलने वाली चकाचौंध एक अद्भुत आभा प्रगट कर रही थी ।
     इतना विशाल गुरुद्वारा ,पूरी तरह दर्शनार्थियों से  भरा हुआ था ।परंतु क्या मजाल कि कहीं कोई शोर शराबा या अव्यवस्था दिखाई दे ! सब के सब श्रद्धा भाव से ,शांत और प्रसन्न चित्त से ,भक्ति के सागर में डूबे हुए से थे ।हम खुद भी न जाने कितने समय तक माहौल में खोए रहे , हमें कुछ पता ही नहीं लगा ।तभी देखा की दर्शनरार्थीय लंगर भवन की ओर जाने लगे ।सिख धर्म की ये विशेष व्यवस्था जिसमे प्रत्येक यात्री ,बिना किसी भेद भाव ,अमीर हो या गरीब एक समान ,एक साथ बैठ कर लंगर यानी भोजन के लिए बैठते है ।तो हम भी उस ओर, यानी गुरु के प्रसाद " भोजन " के लिए भवन की ओर चल पड़े ।लंगर भवन के बाहर ,ही स्वयं सेवक प्रत्येक यात्री को ,भोजन की थाली ,एक चम्मच ,ओर एक कटोरी बड़े ही आदर भावसे देने में लगे हुए थे।हमने भी ये सब ले कर अंदर प्रवेश किया तो हैरान रह गए ।थोड़ी थोड़ी दूरी पर ,समानतर बिछी दरियों पर बैठते जा रहे थे ।उनके बैठते ही ,स्वयंसेवक बड़े बड़े पात्रों में अनेकों प्रकार के भोजन , जैसे कि रोटी ,चावल , दाल ,ओर मीठे में खीर ,एक के बाद एक यात्री को अनुरोध पूर्वक खिला रहे थे ।यात्री भोजन कर के जैसे ही उठते ,अपने बर्तन उठाते ,उनकी जगह दूसरे यात्री भोजन के लिए बैठ जाते ।ये प्रक्रिया लगातार चल रही थी ।मजाल कि किसी यात्री को भोजन के लिए कहना पड़े ।स्वयं सेवक, एक के बाद एक ,लगातार उनकी आवश्यकतानुसार भोजन सामग्री ,बिना किसी विलंब के उन्हे परोस रहे थे ।पूरे हाल में तकरीबन 500 से अधिक यात्री ,लगातार भोजन, एक के बाद एक , कर रहे थे परन्तु कोई आवाज नहीं ।पूर्ण शांति ।ये भी मेरे लिए पहली ही बार एक अपूर्व संस्मरण था ।
    भोजन के बाद हमारे झूठे पात्र ,तुरंत ही एक लाइन में खड़े स्वयंसेवक ,आग्रह पूर्वक हमसे लेते जा रहे थे ,ओर शांति से उन्हें फिर से एक बार परोसने के लिए ,मांजते भी जा रहे थे । उत्सुकता पूर्वक ,जब मैने एक स्वयं सेवक से ,इस लंगर की व्यवस्था के बारे में जानना चाहा तो मुझे उत्तर मिला , उस से मेरा सर श्रद्धा से इन सब के लिए झुक गया ।उसके अनुसार भोजन निर्माण ,परोसने से लेकर सारे कार्य ,प्रत्येक सिख ,गुरु की आज्ञा के अनुसार ,अपनी इच्छा से ,बिना किसी मूल्य के ,अपनी सामर्थ्य के अनुसार कार्य है और अपने को , ऐसी सेवा कर ,धन्य मान कर ,गुरु की सेवा का सुअवसर मानता है ।विश्वास कीजिए ,आज से पहले ,मैने किसी भी धर्म में , ऐसी सेवा का रूप कहीं नहीं देखी । उनके अनुसार सिख धर्म की पहली सिख यही है कि भूखे को भोजन पूरी श्रद्धा से कराएं ।धन्य है ऐसी सेवा और ऐसी सेवा करने वाले !
    अपने को धन्य मानते हुए कि एक ही दिन में , हमें महाराष्ट्र के दो, अनजान,अनायास ,ज्योर्तिलिंग के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ,वहीं सिखों के महान गुरु श्री तेगबहादूर जी के पवित्र स्थल ,महाराष्ट्र के प्रसिद्ध शहर " नांदेड़ " में स्थित श्री नांदेड़ साहब ,गुरुद्वारे के दर्शन का सुअवसर भी मिला ।
     घड़ी देखी ,रात्रि के साढ़े दस बजे थे ,बाजार अभी भी खुले हुए थे तो हमने यही सोचा कि स्टेशन ,जो की यहां से सिर्फ पंद्रह मिनट की पैदल दूरी पर है ,तो बाजार की रौनक देखते हुए चलेंगे ।
    नांदेड़ स्टेशन पर हमारी ट्रेन , हमें  हैदराबाद ले जाने के लिए ,जैसे हमारी ही प्रतीक्षा कर रही थी ,क्योंकि जैसे ही हम अपने डिब्बे में घुसे ,अपनी रिजर्व सीट पर लेटे ही थे कि ट्रेन हमारी मंजिल की ओर रवाना हो गई ,तो हम भी दिन भर की थकान के कारण तुरंत ही सपनों की यात्रा पर निकल गए !

                            ( समाप्त )