रविवार, 13 मार्च 2022

यात्रा .........तुलजा भवानी..!!

                                                     

  
         शोलापुर शहर की सीमा समाप्त होते होते शाम के साढ़े चार के लगभग समय हो गया।हमारा पूर्व का कार्यक्रम कि हम रात्रि नौ बजे तक वापस पूना घर लोट आयेंगे ,इस शोलापुर के चक्कर में ध्वस्त हो गया, था। खैर , अब हम तेजी से तुलजा भवानी की ओर बढ़े जा रहे थे ! वहां पहुंचते पहुंचते शाम के छः बज गए ।हमारी आशा के विपरीत तुलजा भवानी काफी बड़ा शहर दिखाई दिया ।हम गुगल मैप की सहायता से ऐन तुलजा मंदिर के सामने के मार्ग पर जा पहुंचे ।शाम का झुटपुटा, अंधेरों में बदलने लगा था ।तभी हमारी कार को दो गार्डों ने रोक दिया ।कारण पूछने पर बोले " पार्किंग के पचास रुपए दीजिए ," हमने कहा पार्किंग किधर है तो बोले आगे कहीं भी कार खड़ी करदीजिए ।हम हैरान हुए ,सामने एक संकरा सा बाजार था जैसा कि प्रायः धार्मिक शहरों में होता है।हमारे ये कहने पर कि सामने पार्किंग तो दिखाई ही नहीं दे रही ,ये तो बाजार है ,हम रुपए नही देंगे ,तो बोले फिर आप अंदर प्रवेश नही कर सकते ।अब इस जबरदस्ती की वसूली से निराश होते हुए आखिर कार रुपए देने ही पड़े, क्योंकि हम लोकल नही थे। खैर , कार आगे बढ़ाई तो पार्किंग का कोई स्थान ही नहीं था ,आखिर कार एक दुकान के आगे रोकी और दुकानदार के चिक चिक करने के बावजूद हम कार खड़ी कर के आगे बढ़ गए !

                                                        


     लगभग तीन सौ मीटर संकरे ,व्यस्त ,धार्मिक पूजा पाठ ,प्रसाद से भरी दुकानों से होते हुए आगे बढ़े कि अचानक संकरे मार्ग के अंत में एक बड़ा खुला प्रांगण आ गया ,जिसके तीन ओर धार्मिक सामग्रियों से भरी दुकानें थी ,तथा ठीक सामने किले नुमा मंदिर का विशाल दरवाजा था जो रंग बिरंगी लाइटों से चमक रहा था ।उसके ठीक बगल में तीन मंजिला एक विशाल आधुनिक होटल नुमा इमारत थी ,उस के ठीक नीचे तलघर में एक ढलान दार दरवाजा था जहां मराठी भाषा में कई सारे बोर्ड लगे हुए थे ।अब भाषा से अनभिज्ञ होते हुएं,जब किले नुमा विशाल दरवाजे के पास अंदर प्रवेश करने हेतु पहुंचे तो फिर मंदिर के गार्डों ने रोक दिया ।वे मराठी में कुछ कह  रहे थे ,और हम अनपढ़ों की तरह उन्हें देख रहे थे,हमारी समझ में कुछ नही आ रहा था,जबकि तमाम सारे दर्शनार्थी उसके अंदर प्रवेश कर रहे थे ।दरवाजे के सामने विशाल प्रांगण ,ढेर सारे यात्रियों से लबालब भरा था ।तभी हमारे सामने कई सारे धोती कुर्ता पहने पंडित पुजारी आ गए ,और हिंदी में कहने लगे ,पहले होटल नुमा इमारत के तलघर में जा कर यात्रा पास लेकर आइए जो कि एकदम मुफ्त है ।हमारी हैरानी की सीमा ही नही थी कि भाई ,अगर प्रवेश मुफ्त है तो किस बात का मुफ्त कार्ड ! मैं भारत के लगभग उत्तर से लेकर धुर दक्षिण तक प्रत्येक धार्मिक ,ऐतिहासिक एवम अन्य प्रकार के कई स्थानों में जा चुका हूं और प्रत्येक जगह टिकट के लिए ही लाइन लगती थी परंतु यहां मुफ्त के लिए ही लाइन लग रही है । 

                                                        


        भारी भीड़ ,लंबी लंबी लाइनें देख हमने फिर पूछा कि क्या कोई शुल्क देकर मंदिर जो कि एक विशाल किले जैसा ही था ,में प्रवेश लिया जा सकता है तो बोले हां ,और फिर एक ओर ओर संकेत किया।तभी वे सारे बोल उठे ,अरे हम आपको सीधे दर्शन करा देंगे ,पूजा भी करा देंगे ,बस आप पांच सौ रुपए दे दें ! मैं हमेशा ऐसे पंडो के विरुद्ध रहा  हूं ,इस लिए उन्हें इनकार करके शुल्क वाली खिड़की की ओर चल दिया ,लेकिन ये क्या! वो तो बंद थी ,पूछताछ करने पर ज्ञात हुआ कि शुल्क वाले दर्शन केवल शाम छः बजे तक ही हो सकते हैं ,तो अब हमारे पास दो ही मार्ग थे ,या तो उन पंडे पुजारियों के साथ प्रवेश करें  अथवा मुफ्त की टिकट हेतु लंबी पंक्ति में खड़े होना, और हमने पंक्ति में खड़े होना ही चुना ! ! 

                                                        

      काफी देर बाद जब हमारा नंबर आया तो खिड़की के अंदर से कहा गया ,थोड़ा सामने इस एंगल में खड़े होइए,हम आपकी सामने लगे कैमरे से फोटो खींचेंगे ,उसके बाद उन्होंने हमारा मोबाइल नंबर पूछा फिर एक बड़ा सा कार्ड हमे दे दिया ,जिस पर छोटे छोटे ढेर सारे ,कंप्यूटर की कोड भाषा में लिखी पर्चियां चुपकी हुई थी,परंतु हमारी खींची फोटो लगी ही नहीं थी ।कार्ड देख कर प्रतीत हो गया था कि इसका प्रयोग कई बार हो चुका है क्योंकि एक तो वो पुराना था ,दूसरे पुरानी कई पर्चियां उस पर चुपकी हुई थी ! खैर ,कार्ड लेकर हम दरवाजे पर पहुंचे तो हमारा कार्ड हम से ले लिया गया , और हम अंदर प्रवेश कर गए ।

                                                    

          मंदिर के विशाल किलेनुमा दरवाजे के अंदर जैसे ही हमने प्रवेश किया ,हमे समझ में आ गया ये  किले नुमा नही ,वास्तव में एक विशाल किले का विशाल दरवाजा है।ठीक इसके बाद चौड़ी चौड़ी सीढियां सीधे नीचे लगभग दस मीटर तक उतर रही थी ।जगह जगह सुरक्षा के लिए केमरे लगे हुए थे ,साथ ही थोड़ी थोड़ी दूर पर सुरक्षा कर्मचारी खड़े हुए थे ।स्पष्ट था कि ये मंदिर एक विशाल किले का ही भाग है ,और उसका प्रत्येक निर्माण किले के अनुसार ही बनाया गया था।नीचे उतरते ही यात्रियों के मार्ग दर्शन के लिए   बोर्ड लगे हुए थे ।हैरानी की बात थी की इतनी शाम को भी पूरा मंदिर ,नही नही पूरा किला यात्रियों से भरा हुआ था परंतु वे वास्तव में दर्शनार्थी ही थे ,यात्री नही जो केवल किले को देखने आए है।दर्शनार्थियों में बच्चे ,बूढ़े ,जवान ,महिलाए जो पारंपरिक साड़ी में थी ,वापस आते यात्रियों के समूह जिनके हाथों में पूजा की थालियां ,माथे पर बड़े बड़े टिके ,तिलक लगे हुए एक अलग ही दृश्य पैदा कर रहे थे ।एक बात और ,शायद इन यात्रियों में हमें छोड़ कर लगभग सभी महाराष्ट्रीयन ही थे ,ये स्पष्ट था।बाईं तरफ कुछ सीढियां जा रही थी और लगभग सभी यात्री उनके ऊपर पंक्ति बनाए धीरे धीरे सरक रहे थे।सुरक्षा कर्मी जो शायद हमारी हिंदी में बोलने के कारण कुछ विशेष सहयोग दे रहे थे ,ने बताया कि ये मार्ग नीचे बने एक तालाब की ओर जा रहा है जहां सारे यात्री माता तुलजा भवानी के दर्शनों से पहले तालाब में हाथ मुंह धोते है।अब इतनी भीड़ देख कर ,साथ ही हम तो केवल पर्यटन एक थोड़ी सी ही श्रद्धा होने के कारण उधर न जा कर सीधे आगे बढ़ गए।हमारे चारों ओर बड़े बड़े गलियारे ,जिनमे छोटी बड़ी कोठरियां बनी थी ,जिनमे कुछ ही में मंदिर संबंधी कार्यालय बने हुए थे।
                                                        



        थोड़ा आगे बढ़ते ही पुनः काफी नीचे उतरने के लिए बड़ी बड़ी सीढियां दिखाई दी।एक बात और ,किले की विशाल दीवारें ,परकोटे ,,कोठरियां ,सब के सब बड़े बड़े आयताकार पथरों से निर्मित थे ,जिनका रंग समय की मार के कारण काला ,भूरा हो चुका था परंतु आधुनिक काल में उनका रंग ,बड़ी बड़ी ,रंग बिरंगी ,झिलमिलाती लाइटों के कारण दब सा गया था। फिर भी किले की प्राचीनता ,विशालता , हमें ये अहसास दिलाने लगी थी कि हम बीसवीं ,नही ,पंद्रहवीं शताब्दी के शिवाजी काल में थे।इसकी प्राचीनता में इतना अधिक आकर्षण था कि हम उसमें शायद डूबते ,उतरते से लग रहे थे ।इसी आकर्षण में समाते ,धीरे धीरे भीड़ का अंश बनते बनाते, कभी  बाएं ,कभी दाएं ,ऊपर नीचे चलते ,कई अन्य विशाल परकोटे से निकलते आखिर कार ठीक मध्य में निर्मित एक विशाल पत्थरों से निर्मित मंदिर के जो की अपने चारों ओर लगी हुई दर्शनार्थियों की , पंक्तियों से सराबोर ,पूजा ,गायन के स्वरों से गूंजते  ,सामने पहुंच गए ।उसके चारों ओर निर्मित छोटे खुले बरामदे नुमा अनेकों कोठरियां ,जिनमे अधिकांश में पंडे पुजारी ,पूजन सामग्री से ,प्रत्येक यात्री को मराठी भाषा में बुलाते दृष्टिगोचर हो रहे थे ।चारों ओर छोटी बड़ी टीवी स्क्रीन लगी हुई थी जिनमे माता तुलजा भवानी की काले रंग के पत्थर  से बनी ,फूल मालाओं से सजी ,बड़े से मुकुट पहने दिखाई दे रही थी।इस मंदिर के चारों ओर बुजुर्ग ,महिलाए ,बच्चे जो शायद भीड़ के दवाब के कारण, तो कुछ हम जैसे इतनी भीड़ को देख कर दर्शन करें या नही ,इसी सोच विचार में डूबे हुए बैठे थे ।किशोर लड़के लड़कियां सब ओर से बेपरवाह अपनी दुनिया में मस्त ,मोबाइल से सेल्फी लेते इधर उधर घूम रहे थे ।इतनी अधिक भीड़ को देख कर हमारे हौंसले पस्त से हो रहे थे ।
                                                


            अनेकों सुरक्षा कर्मियों से जल्दी दर्शन करने का अनुरोध जब व्यर्थ हो गया तो हम पंडे पुजारियों की शरण में जाने को विवश हो गए ।"" पांच सौ रुपए लगेंगे ,हम आपकी पूजा करा देंगे "" स्पष्ट था कि वो दर्शन कराने का , सरल मार्ग भी बताने को तैयार थे।अब ये सब तो आप जानते ही हैं कि उत्तर भारत के लगभग प्रत्येक मंदिर में भारी भीड़ में यही व्यवस्था ,दर्शनों की सहूलियत प्रदान करती है ,अतः पांच सौ नकद दे कर ,पूजा का आडंबर जिसमे माथे पर तिलक लगाने से लेकर पूजा की थाली में पूजन सामग्री  शामिल थी ,वे हमे सुरक्षा गार्ड के कानों में गुप्त मंत्र फूंक कर ,अपेक्षाकृत एक छोटे मार्ग से ,ठीक मुख्य मूर्ति के आगे लगी पंक्ति में शामिल करके ,कुछ ही मिनटों में देवी तुलजा भवानी की मूर्ति के समक्ष खड़ा कर गए ।अब देवी तुलजा भवानी की मूर्ति को जब तक हम निहारते कि बगल में खड़े सुरक्षा कर्मियों ने हमे बाहर जाने का संकेत ही नहीं किया ,अपितु एक तरह से बाहर की ओर धकेल सा ही दिया।फिर भी एक विशेष संतोष का भाव लिए कि हमने दस मिनट के अंदर अपनी अभीष्ट यात्रा को देवी तुलजा भवानी के दर्शन करने में सफल बना लिया, जिसके लिए हम सैकड़ों किलोमीटर की दूरी से आए थे।देवी के दर्शनों के पश्चात हमने परंपरा के अनुसार मंदिर की परिक्रमा लगाना आरंभ किया ।परिक्रमा बहुत छोटी ही थी परंतु दर्शनार्थियों से खचाखच भरी हुई थी ।पूरा प्रांगण ,सजावटी लाइटों से जगमग था ,ऊपर से गर्मी भी काफी थी ।परिक्रमा लगाते हुए अचानक हमारी दृष्टि ठीक मंदिर के पीछे वाले भाग पर एक अपेक्षाकृत छोटे से बरामदे पर रुक गई जो यात्रियों से पूरा भरा  हुआ था ,लेकिन उस बरामदे के ऊपर लगे एक बड़े से पोस्टर ने जैसे हमारे कदम रोक दिए ।उस पोस्टर में शिवाजी महाराज अपने दोनो हाथ एक देवी की ओर बढ़ाए हुए हैं उधर आकाश में  देवी हवा में ही अपने दोनो हाथों में एक तलवार थामे हुए जैसे शिवाजी को सौंप रही है ।हमे समझते हुए देर नही लगी कि ये तुलजा भवानी है जो अपने नाम की प्रसिद्ध देवीय तलवार शिवाजी को सौंप रही है ,और तब इस पोस्टर के ठीक नीचे जमा भीड़ के कारण जानने को हम भी पीछे जा खड़े हुए ।
                                                        


            बड़ी कठिनाई,धक्के मुक्की के बाद हम जब और अंदर की बढ़े तो देखा कि मंदिर के पीछे की दीवार पर लगे पोस्टर के नीचे थोड़ा सा आगे बढ़े चबूतरे पर एक आदमी लोगों से पैसे ले रहा है ,और फिर चबूतरे पर रखे गोल से ,अनगढ़  पत्थर पर उस पैसे देने वाले दर्शनार्थी से अपने दोनो हाथ ,पत्थर के बाएं ,दाएं रखवाकर कुछ कह रहा है।हम नासमझ से बने ये सब देख रहे थे ,भाषा से अनभिज्ञ होने के कारण वैसे कुछ समझ तो नही आ रहा था ,तभी गौर किया कि कुछ लोगों के हाथ रखने पर वो बड़ा सा गोल पत्थर कभी दाएं घूमता या कभी बाएं घूमता या फिर कभी कभी घूमता ही नही था।ये kotuk देख पत्थर घुमाने हेतु लगी भीड़ से हम भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके ।किसी तरह जब हमारा नंबर भी आया तो चबूतरे पर बैठे आदमी ने हमसे कुछ कहा ।हमारे उस से हिंदी में बोलने पर उसने बताया कि आप प्रत्येक प्रश्न पूछने के दस रुपए देने पर ,इस पत्थर पर अपने दोनो हाथ रखो और मन ही मन  कोई प्रश्न पूछो।अगर पत्थर बाएं की ओर घूमेगा तो नही में उत्तर समझो और अगर दाएं और घूमेगा तो हां में उत्तर होगा।हमने तुरंत दस का सिक्का उसे सौंपा ,और उसके बताए हुए तरीके से दोनो हाथ पत्थर पर रखे ।परंतु यह क्या ! पत्थर ना बाएं घुमा ना ही दाएं ! उसने जाने मराठी में क्या कहा ,और हमसे जाने के लिए कहा।अब अपनी संतुष्टि के लिए हमने फिर दस का सिक्का उसे दिया और वही क्रिया फिर दोहराई ।परंतु पहले की तरह पत्थर को ना तो घूमना था और न ही घुमा ।हम वापस मुड़े और दिल को ये तस्सली दी कि शायद ये पत्थर भी अन्य की तरह केवल मराठी भाषा ही समझता होगा ,और वापस परिक्रमा पूरी करने में लग गए ! !

                                                       



       वापसी में मुख्य दरवाजे तक वापस आने में चढ़ी सीधी सीढियौ ने जैसे हमारी बची खुची धैर्य की परीक्षा लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी ,हम भक्ति भाव से अधिक ,शिवाजी महाराज की कुलदेवी से साक्षात रूबरू होने के संतोष से ,इन सब कष्टों को विस्मृत कर आखिरकार मंदिर के बाहर खुले प्रांगण में आ पहुंचे ।
                                            

    उस प्रांगण में, समीप ही बनी पत्थरों से ही बने दीवारों पर बैठ कर अपना पसीना  सुखा कर,कुछ देर  थकान मिटाई ,फिर वापसी के लिए उसी संकरे ,पूजा की सामग्रियों से भरे बाजार से होते हुए अपनी कार तक पहुंचे , जहां सामने का दुकानदार आग्नेय नेत्रों से जैसे हमे भस्म करने के लिए  तत्पर दिख रहा था।बिना उसकी ओर देखे हम चुपचाप अपनी कार मोड़ कर वापस पूना जाने के लिए मुख्य मार्ग की ओर बढ़ चले !

                                            

       शायद मैं इस यात्रा के विवरण को यहीं विराम दे देता ,अगर वापसी में एक दुर्घटना से हम बाल बाल ना बचे होते।मुख्य मार्ग तक आते आते रात्रि के नौ बज चुके थे ।देरी एवम थकान से सराबोर होते हुए भी चालक के रूप में बैठे अपने बेटे को धीरे धीरे चलने एवम घर पहुंचने की कोई जल्दी नहीं है ,कहते हुए स्वयं भी अंधेरे में पूरी तरह डूबी , विरान सी सड़क पर सामने दृष्टि गड़ाए चेतन्यता से बैठे थे ।अभी हम इस शहर से कुछ ही किलोमीटर दूर पहुंचे थे कि अचानक एक स्कूटी सवार तेजी से हमें ओवरटेक करता हुआ ,सड़क के ठीक बीच मैं आ  गया ।हम उसकी इस तेजी को देख हैरान होते हुए  चालक सीट पर बैठे अपने बेटे से बोले,इसे शायद बहुत जल्दी है ,तुम थोड़ी स्पीड कम कर लो ,इसे जाने दो ,तो बेटे ने जैसे ही कार की स्पीड कम ही की थी कि स्कूटी सवार तीव्र गति से चलते हुए कभी एक दम सड़क के बाएं किनारे तो कभी दाएं किनारे ,अपनी स्कूटी को लहराते हुए चलने लगा ।इसे देख मेरे बेटे ने स्पीड और कम करली  ,जिस से उस स्कूटी सवार और हमारी कार के मध्य फैसला कुछ और कम ही  हुआ था कि अचानक वह स्कूटी सवार ,अपनी स्कूटी को लहराते हुए ठीक एक दम बाएं किनारे पर आ पहुंचा ,और इस से पहले कि हम कुछ समझ पाते ,हालांकि तब तक हम ये समझ चुके थे कि स्कूटी सवार नशे में धुत था ,किनारे चलते एक साइकल सवार से पीछे से जोरदार ढंग से जा टकराया !अगले ही पल दोनो सवार हमारी धीमी गति कार के सामने बीच सड़क पर ढेर हो गए ।उन दोनो के मध्य स्कूटी सवार की तेज स्पीड होने के कारण टक्कर भयंकर ही हुई थी।वो तो बेटा कुछ ही क्षण पूर्व सावधान हो चुका था इस लिए उसने कार को तेजी से बाईं ओर काट ली ,और आपस में टकराने के बाद सड़क पर ढेर हुए दोनो सवारों से बाल बाल बचतें हुए आगे बढ़ गया ।उस क्षण जैसे हमारी सांस रुक ही गई थी ।अनजान प्रदेश ,रात्रि का समय होने के कारण ना चाहते हुए भी हम नही रुके और अपनी मंजिल ,पूना शहर की ओर पांच घंटे बाद मध्य रात्रि को पहुंच कर ही दम लिया।शेष रात्रि हमारे थकान से सराबोर होने के बावजूद,, भी उस संभावित दुर्घटना से बाल बाल बचने के सदमे के कारण जागरण में ही कटी।फिर भी एक संतोष हृदय में था कि आखिरकार हमने शिवाजी महाराज की महत्व पूर्ण घटना के गवाह ,प्रतीकों को अपनी आंखों से देख आए थे !!
                                                          



यात्रा ............तुलजा भवानी ..!!

                                                    


        "" तुलजा भवानी "" इस शब्द से शायद ही हम उत्तर भारतीय परिचित होंगे ,और अगर  थोड़े परिचित भी होंगे तो केवल अजय देवगन  की बनाई फिल्म "" तानाजी "" फिल्म जिसमे वीर शिवाजी की वीर गाथा का चित्रण हुआ है ! अब आप समझ गए होंगे कि तुलजा भवानी का किस स्थान और किस वीर के साथ संबंध है।आप ठीक समझे ,तुलजा भवानी महान मराठाओं के महान वीर " शिवाजी महाराज " की कुल देवी थी ! 
                                                    

                                                        
        तानाज़ी फिल्म के बाद मेरी भी उत्सुकता शिवाजी महाराज की इन कुलदेवी के बारे में और बढ़ गई थी ,परंतु ,इन देवी के बारे में हिंदी साहित्य में बहुत ही थोड़ी सी जानकारी मुझे मिल पा रही थी । ऐसे में जब मुझे अपने छोटे बेटे के पास पूना जाने का सुअवसर मिला ,और वहां पूना में लोकल घूमते फिरते जब मेरे कानों में ,और लोगों की बातचीत में तुलजा भवानी के बारे में पता चला तो पूना आने के कुछ दिन बाद मैने बेटे से कहा कि मुझे पूना में शिवाजी महाराज के किले में स्थित उनकी कुल देवी तुलजा भवानी के मंदिर देखने की इच्छा हैं तो उसने कहा ठीक है अगले हफ्ते इतवार को चलेंगे ,तो मैने कहा इतवार की क्या आवश्यकता है ,पूना में तो ये है ही तो कल शाम ऑफिस के बाद चलना ।अब उसने जो उत्तर तो मेरे साथ साथ शायद आप भी हैरान जरूर होंगे।उसने कहा "" पापा ,तुलजा भवानी जो की वीर शिवाजी की कुल देवी हैं ,उनका स्थान अथवा मंदिर पूना से लगभग साढ़े चार सौ किलोमीटर से अधिक दूरी पर,पूना से हैदराबाद जाने वाले राजमार्ग पर स्थित शोलापुर शहर से भी पचास किलोमीटर की दूरी पर " तुलजा पुर " शहर में स्थित है ! क्या कहा ,पांच सौ किलो मीटर दूर ,और उनके नाम का एक शहर भी है , मैने चकित होते हुए कहा तो वो बोला , हां पापा हां ! " वैसे मेरी भी वहां जाने की इच्छा है क्यों कि कुछ पता नहीं मेरा ट्रांसफर कब किसी और शहर में हो जाए " ।बस फिर क्या था ,बड़ी ही बेसब्री से आगामी रविवार का इंतजार समाप्त हुआ और , कार द्वारा हम सब पूना से तुलजा भवानी की ओर सुबह नौ बजे के लगभग निकल पड़े , हां ,एक बात और , सब ने तय  कि घर से नाश्ता करके ही चलेंगे ,और दोपहर का भोजन हम शोला पुर जा कर ही करेंगे क्योंकि दोपहर होने तक ही हम शोला पुर पहुंच पाएंगे।अब हमे क्या एतराज था ,तो ठीक नौ बजे के लगभग हम चल पड़े महान मराठा वीर, महान शिवाजी महाराज की कुल देवी "" तुलजा भवानी " के दर्शन करने ! यहां एक बात आप सबको और बताता 
 चलूं की इन कुलदेवी के दर्शन की इच्छा धार्मिक भावों से अधिक शिवाजी महाराज से जुड़ी होने के कारण अधिक थी।एक बात और सुनें कि मराठा इतिहास में ये कहा जाता है कि जब मुगल अपनी पूरी शक्ति के साथ संपूर्ण भारत की विजय यात्रा पर निकले तो दक्षिण भारत में सबसे प्रथम उनका मुकाबला, इस विजय यात्रा में उनकी सबसे बड़ी रूकावट ,मराठा राज्य से होनी थी एवम उनका मुकाबला, उस समय के वीर शासक वीर शिवाजी महाराज से होनी निश्चित थी।अब ये तो इतिहास की बात है कि बाकी सब क्या हुआ ,परंतु मराठाओं की छोटी सी सेना महान मुगलों के आगे कहीं नहीं टिकती थी ,तो कहा जाता है कि इन वीर शिवाजी ने दुश्मनों से मुकाबला करने हेतु अपनी कुल देवी की कई दिनों तक आराधना की थी जिसके परिणाम स्वरूप कहते हैं कि उनकी कुलदेवी " तुलजा भवानी "  उनकी साधना से खुश हो,प्रगट हो कर उन्हे दो तलवारें भेंट दी थी जिसे उन्होंने नाम दिया था "" तुलजा और भवानी "" ! तो मेरे साथ चलिए महाराष्ट्र के गौरव ,महान वीर शिवाजी महाराज की उनकी प्रसिद्ध तलवार ," तुलजा एवम भवानी " जिस के बारे में बताया जाता है कि जब तक ये तलवारे शिवाजी के पास रहीं तो मृत्यु पर्यन्त उन्होंने कोई भी लड़ाई नही हारी ,साथ ही ये भी माना जाता है कि उनकी मृत्यु के पश्चात ये दोनो तलवारें भी रहस्यमय ढंग से लापता हो गई थी ,तुलजा भवानी शहर की ओर ! !
    घर से चलते चलते अभी हमने चार सौ किलो मीटर की यात्रा ही की थी कि अचानक मुख्य मार्ग पर लगा एक बोर्ड दृष्टिगत हुआ "" पंढरपुर "" पचास किलो मीटर दाईं ओर ! इन पंढरपुर की यात्रा के बारे में , मैं अपने ब्लॉग में पूर्व में अनुभवों को लिख चुका हूं ,और अगर आपने अभी तक इस यात्रा का विवरण नही पढ़ा है तो कृपया पढ़ें और उस यात्रा का आनंद लें !तो बात हो रही थी " पंढरपुर " लिखे बोर्ड की ,तो मेरी श्रीमती और पुत्र दोनो बोल उठे ,अरे ये इतना समीप है अब ,तो क्यों ना एक बार अवसर का लाभ वे भी उठा लें ,और उन्होंने कार बाईं ओर मोड़ ली ( मेरे इंकार की तो ऐसी परिस्थितियों में कोई गुंजाइश ही नहीं थी जबकि श्रीमती भी साथ हों ! )! अब चूंकि मैं ये यात्रा पूर्व में ही कर चुका हूं तो मैं इसके बारे में नहीं लिखूंगा ।

                                                    


                                                       
     तुलजा भवानी शहर की ओर मेरी यात्रा का विवरण अब उस स्थिति से आरंभ  होता है जब हम पंढरपुर शहर से वापस शोलापुर शहर की ओर जाने  लगे  ! अब एक बात और यहां स्पष्ट कर दूं कि दो बजे दिन का समय हो चुका था ,और बेटे की इच्छा थी कि चूंकि शोलापुर यहां से सिर्फ पचास किलोमीटर ही है ,और वो एक बहुत बड़ा शहर है पूना ही जैसा तो दो पहर का भोजन शोलापुर के किसी बड़े नामी होटल में ही करेंगे ,भले ही हम सब के पेट में चूहे पूरी ताकत से उछल कूद कर रहे थे,लेकिन इंकार का तो प्रश्न ही नहीं था  !! 
                                                    

    अब क्या बताएं कि शोलापुर आते तीन बज गए । जैसे कि मेने पहले बताया था ,शोलापुर एक बहुत बड़ा शहर है ,और हम प्रथम बार ही यहां आए थे तो किसी अच्छे होटल , जहां हम दोपहर का भोजन करते ,का हमे कुछ पता नहीं था।थोड़ी देर भटकने के बाद , जैसा की आजकल होता ही है ,हम गुगल बाबा की शरण में चले गए,और उसके दिखाए मैप के आधार पर हम शोला पुर में भटकने लगे ,तमाम सारे चौराहों को पार करते करते शाम के चार बजे का समय हो चला ! ये ऐसा समय होता है कि अधिकांश खाने के रेस्टोरेंट ,,ढाबों में भोजन खिलाने वाले ,और खाने वाले दोनो ही अनुपस्थित रहते है ,तो आप समझ सकते हैं कि हम जिस भी रेस्टोरेंट में जाते ,हमे निराशा ही मिलती ,और जैसे जैसे हम रेस्टोरेंट से निराश होते जाते उतनी ही हमारी भूख बढ़ती जाती ,बात यहां तक आ गई की भाई दाल रोटी न सही ,इडली डोसा ही सही ,परंतु यहां इस से भी इंकार ! हमें तो समझ ही नही आ रहा था कि हमारे उत्तर भारत में तो सुबह छह बजे से रात्रि बारह क्या दो ,तीन बजे तक भी भोजन मिल जाता है ! भाई ,शायद इन दक्षिण भारत के शहरो में खाने का कोई अलग एवम निश्चित ही समय होता होगा !
    आखिर कार ,एक बड़े नामी गिरामी होटल वालों को शायद हम भूख से बेहाल यात्रियों पर दया आई होगी तो ,वो एक शर्त पर तैयार हुए कि आपके लिए हम भोजन खिलाने को रेडी हैं परंतु इसकी तैयारी में आधा घंटा से अधिक समय लगेगा एवम थोड़ा विशेष चार्ज देना होगा ,असहमति का तो कोई प्रश्न ही नहीं था ,ये सोच कर ही सबर कर लिया कि इंतजार का फल मीठा होता है ! लेकिन अब आपको क्या बताएं ,इतनी शर्तें मानने के बाद जो भोजन आया तो हमसे, भयंकर भूखे होने के बाद भी खाया नही गया ,वो इस लिए कि हम भोजन में प्याज का साथ तो पसंद कर लेते हैं परंतु लहसुन " बाप re बाप " थोड़ा बहुत तो छोड़ो जैसे की भोजन का मुख्य भाग ,चाहे पनीर की सब्जी हो अथवा पीली दाल ,लहसुन ही था ,पहला ग्रास चखते ही लगा कि पनीर के स्थान पर जैसे लहसुन की पूरी एक गांठ ही मुंह में आ गई हो ! साथ ही हम उत्तर भारतीयों के लिए इन दक्षिण भारत के शहरों के भोजन में प्रयुक्त तड़का तो हमारी समझ ,स्वाद से एक दम अलग था !! बस अब यूं समझिए कि केवल आर्डर को चखने के बदले उस बड़े होटल की बड़ी फीस को चुका कर हम सीधे अपनी कार की ओर दौड़े ,और जेब में रखी इलाइचियों को मसलते, पीसते शहर से बाहर की ओर भागे ,सीधे तुलजा भवानी शहर की ओर ! ! !
                                                           

                                                                                                                                ( शेष क्रमश : अगले भाग में )
                                                        





कबूतर ................एक आतंकवादी

                                                        
                                                            



         शायद इस शीर्षक को पढ़ कर आप सब आश्चर्य में पड़ गए होंगे कि ये क्या लिखा है, परंतु जब आप मेरे साथ इस शाब्दिक अनुभव को पढ़ेंगे तो निश्चय ही आप का दृष्टिकोण बदल जाएगा।
        कबूतर पूरे विश्व में शांति एवम सद्भावना तथा प्रेम का प्रतीक जाना जाता है। जब इसकी "" गुटर गू ,गुटर गू " कानों में पड़ती है तों सब समझ जाते है कि ठिठुरती सर्दी की अब विदाई हो चुकी है और सुखदायक गर्मी अपनी चादर फैलाने आ पहुंची है।शायद ही पूरे संसार में यही एक मात्र प्राणी है जो किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है सिवाय एक प्राणी को छोड़ कर और श्रीमान वह प्राणी है "" मनुष्य ""! क्यों चौंक गए ना ,और जब में इस लेख के द्वारा कारण बताऊंगा तो निसंदेह ही आपकी धारणा बदल जायेगी बिल्कुल मेरी ही तरह !
         अपनी बैंकिंग सर्विस के 40 वर्षों के अंतर्गत मुझे कई बार ट्रेनिंग हेतु महानगरों में जाना पड़ा है जहां गगनचुंबी विशाल इमारतों के मध्य ,अध्ययन के दौरान मेरी दृष्टि अनायास बड़ी बड़ी शीशे की खिड़कियों पर पड़ती थी , जहां शीशों के दूसरी तरफ अक्सर मेरी दृष्टि रुक जाती थी ,और उसका कारण होता, उन सीलबंद ,अर्ध पारदर्शी शीशों के पार ,मेरी पसंद के प्राणी कबूतरों की चुहल बाजी ! वे अक्सर जोड़े के रूप में एक दूसरे की चोंच से चोंच मिलाते  ,एक दूसरे को धकियाते ,फिर जब एक उड़  जाता तो दूसरा भी पंख फैलाए उसके पीछे पीछे उड़ जाता ,या फिर जब वे वापस आते और अनायास उनकी दृष्टि शीशे में पड़ती अपनी छवि पर पड़ती तो उसे वे अपना साथी अथवा प्रतिद्वंदी समझ चोंच से वार करते ।इसी तरह की वे अजीब अजीब   हरकते करतें रहते ,इस बात से बेखबर कि शीशे के दूसरी ओर कोई उनके इन कार्यकलापों पर अपनी दृष्टि गड़ाए बैठा है । मैं उनकी इन शरारतों को देखते देखते इतना मगन हो जाता कि मुझे ये ध्यान ही नही रहता कि मैं एक लेक्चर सुनने के लिए बैठा हूं ,तब जब लेक्चरर मुझे टोकते तो जैसे मैं एक गहन स्वप्न से जाग उठता।फिर भी वे मुझे इतने अधिक आकर्षित करते कि अपने  लेक्चरों के बीच मैं तिरछी नजरों से उन के विभिन्न कार्य कलापों को ना चाहते हुए भी देखने का लोभ संवरण नही कर पाता था, भले ही इस दौरान मुझे कई बार लेक्चररों की  नाराजगी  भी सहनी पड़ी थी ।
      इसके अलावा कई बार मेरे बचपन में इन कबूतरों के जोड़ों ने घर में अपना घोंसला बनाया था।उस दौरान जब भी मैं इन कबूतर के बच्चो के नन्हे नन्हे बच्चों के कोमल पंखों की फड़फड़ाहट ,उनके मां बाप के उनके लिए दाना पानी लाते देखता तो जैसे इस क्षणों मैं प्रायः सब कुछ भूल जाता।


                                                        

        

            ये सारे सुखद अनुभव जब एक त्रासदी जी हां त्रासदी में बदले जब में अपने बेटे के पास पूना आया ।उसका फ्लैट एक बहुमंजिली इमारत में दसवें फ्लोर पर है।उस फ्लैट के दोनों ओर बालकोनी है जिसमें खड़े होकर बाहर देखने पर पूना शहर की हरियाली देखने पर आंखो को बड़ा ही सुकून मिलता था ,इस लिए अपने पूना प्रवास के दौरान में दिन का अधिकांश समय बालकोनी में ही व्यतीत करता था ।पर यह क्या ! इस बार पूना आ कर जब मैं बालकोनी में बैठने के लिए गया तो देखा ,उसके तीनों और एक इंच चौड़ाई के घेरे वाली प्लास्टिक की जाली लगी हुई है। मैने बहुत दिमाग लगाया ये सोचने में कि ये घेराबंदी आखिर किस लिए की गई है ,ये शर्तिया मच्छरों के लिए तो हो ही नही सकती ,क्योंकि इस जाली की चौड़ाई से मच्छर तो क्या कीट पतंगे भी नही रुक सकते ,तो फिर इसके लगाने का क्या कारण हो सकता है।जब सोच सोच कर हार गया ,कोई भी कारण दिमाग में नहीं घुसा तो आखिरकार बेटे से ही पूछना पड़ा ,और जब उसने जो उत्तर दिया तो एक बार तो सुनकर मैं हैरान ही रह गया ।क्या ये भी कारण हो सकता है !!वो बोला पापा ,ये निरीह पक्षी नही ,ये तो पक्के आतंक वादी हैं आतंकवादी !! मेरे हैरानी से ,प्रश्नवाचक दृष्टि से देखने पर वो बोला कि याद कीजिए ,इस से पहले जब आप पूना आते थे तो इन बालकोनियो में हमेशा कबूतरों की बीट पड़ी रहती थी ,घरेलू काम करने वाली रोज रोज रगड़ के पोंछा लगती ,फिर अगले दिन वही समस्या ,और याद कीजिए कभी कभी तो कबूतर सीधे हॉल में ही आ जाते ,और अगर हम ध्यान नहीं देते तो मौका मिलते ही वे हमारे कमरों के किसी भी कौने में अपना घोंसला बनाने से भी नही चूकते ,इस के अलावा हम तीन चार दिन के लिए कहीं बाहर जाते ,और गलती से अगर कोई खिड़की खुली रह जाती ,और ये कहीं अंडे दे देते तो फिर मुसीबतों की शुरुआत हो जाती ।इतने सीधे पक्षियों के अंडे ,घोंसले सहित हटाने को हमारा दिल नही करता ।तब ये समझिए दो तीन महीने के लिए हमारा जीना मुश्किल हो जाता।क्यों ? वो इस लिए कि उन तीन महीनों में पूरे घर में घोंसलों से गिरते तिनके इधर उधर बिखरते रहते ,कभी कभी तो वो हमारे खाने पीने की वस्तुओं में भी गिर जाते ,अक्सर आते जाते उनके पंख फड़फड़ाने से जहां हमारे कार्य की एकाग्रता में व्यवधान पड़ता वहीं कभी कभी उनके पंख टूटकर इधर उधर पूरे घर में उड़ते रहते ,इसके अतिरिक्त एक बात और अक्सर घोंसलों में से ,अंडों में से निकले नन्हे नन्हे बच्चे नीचे टपक जाते , जिनसे हमारे हृदय दहल जाते।उसके बाद कबूतरों के बैचेनी से फड़फड़ाने से कई दिनों तक हमें रात को नींद भी नहीं आती।ये सब तो फिर भी हम सहन कर लेते ,पर इस दौरान अगर कभी हमें कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर जाना पड़ता तो तो इन माता पिता कबूतरों के कारण हमें अपना कार्यक्रम छोड़ना पड़ता।ये सब कभी कभार होता तो चलता ,परंतु ये तो हर वर्ष होने लगा तो हमारे धैर्य की सीमा समाप्त हो गई।कितनी ही बार हम उन कबूतरों को भगाने का प्रयत्न करते परंतु सब निष्फल ,क्योंकि कबूतरों को मनुष्यों के साथ रहने की आदत हो गई थी ! जब बहुत परेशान होने लगे तब एक दिन हमने अपने पड़ोसी से ये कहा कि इस सोसायटी को हम इन कबूतरों के कारण छोड़ने की सोच रहे हैं तो वो हंसने लगा ।कहने लगा ,तुम पूना में कहीं चले जाओ,किसी भी सोसायटी में घर ले लो ,ये तो पूरे पूना में है ,और हम ही नही जब अधिकांश पूना के निवासी मेरे जैसे परेशान होने लगे तो उन सबकी परेशानी देख शहर के एक व्यापारी का दिमाग चला और उसने बाकायदा विज्ञापन देकर हमेशा के लिए एक हल निकाला।जब उनसे संपर्क किया तो उन्होंने जो हल बताया वो अनोखा था।
                                                        

     

            मेरे पड़ोसी ने बताया कि देखो मेरे फ्लैट को देखो , मैने क्या उपाय किया है । मैने उन व्यापारी से दोनो बालकोनियो में ये प्लास्टिक की एक इंच चौड़ी जाली तीनों और फिट करवाली है।कुछ दिन तो कबूतर फड़फड़ाते आते ,परंतु जाली के पास आ कर वापस उड़ जाते ।
    बस फिर क्या था ,बेटा बोला , मैने भी बालकोनियो के चारों ओर ये जाली फिट करवादी है।और हां पापा , मैने ही नहीं पूरी सोसायटी ने ये जाली फिट करवादी है।
   पहले तो मुझे कुछ समझ नहीं आया ,फिर कुछ दिन बाद मैने अनुभव किया कि अब कबूतरों के झुंड इस सोसायटी से विदा ले चुके है।

                                                       

 
       सच कहूं ,आरंभ में तो मुझे बिना कबूतरों कुछ अजीब सा लगा ,उनकी फड़फड़ाहट , उनके  ऊंची ऊंची इमारतों से एक दम नीचे उड़ कर गोता लगाना ,मुझे बहुत पसंद था परंतु अब रोज रोज की बालकनी की सफाई के झंझटों से मुक्ति भी मिल गई थी।
     फिर अचानक टीवी पर एक विदेशी चैनल देखते देखते एक डॉक्यूमेंट्री मैने देखी जो अमेरिका के सबसे बड़े ,सबसे घने बसे ,गगनचुंबी इमारतों के संदर्भ की थी ।उसके अनुसार न्यूयार्क की बहुमंजिली इमारतों को कुछ वर्ष पूर्व इन कबूतरों के झुंड के झुण्डों ने 
अपनी शरण स्थली बनाली थी ,उनकी आबादी में भी विस्फोटक रूप से बढ़ोतरी हो गई थी ,क्योंकि गगन चुंबी इमारतों के ऊपर रहने वाले इन कबूतरों के कोई भी प्राकृतिक शत्रु जैसे बिल्ली ,कुत्ते आदि नहीं थे ।अपितु इस कारण आसपास के जंगलों से इन कबूतरों का शिकार करने वाले बाज पक्षी भी  शिकार करने के लिए इन इमारतों में आ बसे थे ।जिस से पहले ही परेशान न्यूयार्क के निवासी और अधिक परेशान होने लगे थे।अक्सर कबूतर एवम बाज की छीना झपटी में वे इन गगन चुम्बी इमारतें जो विशाल शीशों से सजी हुई थी उनसे टकराते ,उनमें खरोंच डालते ,उन्हे गंदी करते ।उनकी रोशनी एवम ताजी हवा के लिए जो रोशनदान होते ,उस कारण उन्हें भी समस्याओं से जूझना पड़ता जिनसे मेरा बेटा जूझा था ।तब वहां भी यही जाली लगाई गई ,जिनके कारण काफी हद तक न्यूयार्क निवासियों की परेशानी खत्म हो गई।

                                                

    
            इस के कुछ दिनों पश्चात किन्ही कारणों से मुझे पूना के अस्पताल में जाना पड़ा तो देखा कि इस अस्पताल की सारी बालकनियों में यही जालीदार जाली लगी हुई थी।फिर तो अक्सर पूना भ्रमण के दौरान मेरी दृष्टि अनायास पूना की बहुमंजिली इमारतों
पर टिक जाती ,और मैने देखा की अधिकांश इन इमारतों की बालकोनियो में यही जाली लगी हुई थी।अब पूना भ्रमण करते मेरा ये शगल सा बन गया था कि मैं अक्सर पूना के अधिकांश निवासियों से जब इस बाबत बात करता उनमेंसे अधिकांश की राय इन कबूतरों के बारे में यही थी कि ये भोले भाले दिखने वाले पक्षी  उनकी परेशानी की एक बड़ी वजह है।इसके बाद जब मैं दिल्ली की भी अधिकांश गगन चुम्बी इमारतों में रहने वाले परिचितों से जब इन कबूतरों के बारे में उनकी राय जाननी चाही तो मुझे जरा सी भी हैरानी नही हुई ,क्योंकि मैं पूना के अपने अनुभवों से जान चुका था कि आधुनिक समय में ये निरीह से ,शांत दिखाई देने वाले कबूतर ,शांति के दूत नही अपितु " आतंकवादी है आतंकवादी "" ! !

     पाठको ,शायद मेरी इस बात से   आज आप सहमत ना हों परंतु जब कभी मेरे बेटे ही नहीं ,पूरे पूना शहर के वासियों की तरह आप को इस परेशानी से दो चार होना पड़ेगा तब आप मेरे बेटे की तरह ही अनायास बोल उठेंगे कि ये भोले भाले कबूतर नही ,अपितु ये आतंकवादी हैं आतंकवादी ! !
                                                        

      

रविवार, 16 अगस्त 2020

कहानी ................. "" ख्याल रखना ""

                                      कहानी ................. "" ख्याल रखना ""
 


     "" सर, आपसे मिलने के लिए एक बुजुर्ग से व्यक्ति काफी देर से खड़े है वे ..," " मुझे बहुत काम है, मना कर दो"।" सर, मैने ये सब कहा था ,परन्तु वे आपसे मिलने की जिद पर एडे हैं ,कहते हैं कि वे बहुत दूर चंदेरी शहर से आए हैं,साथ ही कह रहे हैं कि वे आपके अध्यापक रहे हैं "। "" क्या ,मेरे अध्यापक ,अच्छा तो अंदर भेज दो ,रुको रुको मेरे अध्यापक रहें हैं तो मै खुद ही उनके पास जाता हूं" ।
         यह कह कर एस पी पुलिस महेश उठ खड़े हुए ।तेज कदमों से जैसे ही वे मुलाकतियों के कमरे में पहुंचे तो चौंक पड़े।उनको देखते ही महेश उनके चरणों को स्पर्श करने के लिए झुक गए ।चरण छूने के कुछ ही क्षणों में जैसे वे समय के पुराने दौर में ,अपने छात्र जीवन के दौर में पहुंच गए।
     स्कूली शिक्षा के समय उसकी एक ही आकांक्षा थी पुलिस में इंस्पेक्टर बनने की।कहते हैं ना कि अगर लगन सच्ची हो तो ऊपर वाला भी किसी ना किसी रूप में मदद करता है और ये मदद उसे इन्हीं अध्यापक के रूप में मिली थी।इन्हीं अध्यापक जी ने महेश में छुपी प्रतिभा और लगन को पहचान लिया था।उन्हीं की सहायता से महेश एक एक कर के राह में पड़ने वाली तमाम बाधाओं को पार करते हुए अपने दिव्य स्वप्न की पूर्ति में 
सफल हुआ था ।
         आज महेश इन्हीं अध्यापक की सहायता से पुलिस के एस पी पद तक जा पहुंचा था।महेश ने अति आदर के साथ अपने अध्यापक जिन्हें वो आदर के साथ गुरुजी कहता था को अपने चेंबर में बिठाया ,अपने सहायकों को आदेश दिया कि अब जो भी मिलने आए उसे कल का समय दे दे,साथ ही उसने अपने विशेष सहायक को बुलवाया और उसे नाश्ते आदि के लिए कहा तो मास्टर साहब ने रोक दिया।महेश के अधिक आग्रह पर कहा कि मुझे शुगर हो गई है इस लिए खाने पीने में सावधानी रखनी पड़ती है,फिर भी महेश के बहुत कहने पर उन्होंने थोड़ी सी नमकीन और फीकी चाय ही स्वीकार की।
     दोनों बातों में इतने खो गए कि उन्हें समय का याद ही नहीं रहा।अचानक गुरुजी ने घड़ी देखी ,बोले ,अरे इतना समय कब बीत गया पता ही नहीं चला,मुझे अभी सात घंटों की यात्रा करनी है चंदेरी तक।" लेकिन गुरुजी " महेश बोला " हो सके तो आज मेरे पास ही रुकिएगा , कैसे भी आपकी गुरु दक्षिणा चुकानी है " । गुरुजी हल्के से मुस्कुराए,महेश के सिर पर हाथ फेरा ,बोले " तुम जिस पद पर बैठे हो ,उस पद के अनुसार ही लोगों की सुनते रहना ,शब्दों के जाल में नहीं आते हुए दिल की भी सुनना ,तुम्हे ढेर सारी दुआएं मिलेगी ,साथ ही मेरी गुरु दक्षिण भी  चुकती रहेगी " । महेश अवाक से अपने गुरु के चरणों में झुक गए।
      महेश ने तुरंत अपने पी ए को बुलाया और कुछ उसके कान में कुछ कहा ।थोड़ी ही देर में पुलिस की एक जीप सामने आ खड़ी हुई।अब महेश ने गुरुज से कहा कि आपको ये जीप झांसी तक छोड़ आएगी,उसके आगे ... तभी गुरुजी ने कहा " नहीं ,महेश ,नहीं, मै बस से ही आया हूं और बस से ही जाऊंगा।यहां से सीधी झांसी तक बस मिल जाएगी ,झांसी से चंदेरी तक खूब बसें चलती है ," जाने गुरुजी की बातों में क्या असर था कि महेश ने कहा कि ठीक है बस स्टैंड तक आपको ये जीप छोड़ देगी ।महेश ने पुनः एक बार अपने गुरु के पैर छुए और उन्हें तब तक देखता रहा जब तक कि जीप आंखों से ओझल नहीं हो गई।
      बस स्टैंड पर झांसी की बस तैयार खड़ी थी।गुरुजी उसमे चढ़ कर अपने लिए नियत सीट पर बैठ गए।उन्होंने इस बात पर जरा भी गौर नहीं किया कि उनके साथ जीप में सवार दो बंदूक धारी पुलिस वाले भी उनके पीछे वाली सीट पर ही बैठ गए हैं।
      कुछ ही देर में बस चल दी।बस शहर से हाई वे पर दौड़ रही थी।लगभग एक घंटे की यात्रा हो चुकी थी,तभी अचानक गुरुजी ने अपनी सीट से उठ कर कंडक्टर के पास जा कर उसके कान में कुछ कहा।उसने तुरंत सीटी बजा कर बस को रुकवा दिया ।गुरुजी नीचे उतरे और एक ओर ओट में हो गए।उनके पीछे बैठे दोनों सिपाही बेचैन हो उठे ।वे अभी कुछ सोच ही रहे थे कि गुरुजी वापस आ कर अपनी सीट पर बैठ गए। बस पुनः चल पड़ी।
          इसी तरह और एक घंटे के करीब सफर चल रहा था कि गुरुजी सीट से उठे ,कंडक्टर से कुछ कहा ,उसने बस फिर रुकवाई ,गुरुजी नीचे उतरे , और ओट में हो गए ।अब तो सिपाहियों की बेचैनी और उत्सुकता ऑर बढ़ गई। शायद उनकी पुलिसिया बुद्धि जागने लगी थी। उन्हें गुरुजी 
के साथ झांसी तक रहने को कहा गया था,साथ ही झांसी से चंदेरी तक गुरुजी की बस यात्रा के लिए भी उस जिले की पुलिस के सिपाहियों का इंतजाम करने को कहा गया था।अब ये पुलिस वाले बेचैन होने लगे थे।आखिर क्यों ये बुजुर्ग सा यात्री, हाई वे पर बार बार क्यों बस रुकवा रहा है ।वे दोनों अपनी सीट से खड़े हो गए और जैसे ही बस से नीचे उतरने ही वाले थे कि उन्हें वो बुजुर्ग वापस बस की तरफ आते दिखाई दे गए।पुलिस वाले चुपचाप वापस अपनी सीट पर जा बैठे।उनके सामने गुरुजी भी आ बैठे , और बस पुनः झांसी की ओर चल दी।
      वे दोनों पुलिस वाले पूरी तन्मयता से गुरुजी पर निगाहें टिकाए हुए थे।लगभग एक घंटे की यात्रा के पश्चात जैसे ही झांसी शहर आने ही वाला था कि गुरुजी फिर उठ खड़े हुए और कंडेक्टर के कान में कुछ बोले ,परन्तु अबकी बार कंडैक्टर ने इनकार में सिर हिलाया।गुरुजी वापस अपनी सीट पर आ बैठे।अब तो मानो पुलिस वालों का धैर्य जवाब देने लगा।उन्हें गुरुजी की हरकतों पर शक होने लगा, उनमें से एक पुलिस वाला खड़ा हो गया और गुरुजी कि ओर बढ़ा ही था कि कांडेक्टर ने जोर से बस यात्रियों को संबोधन किया "" झांसी  का सिपिया बाजार आने वाला है ,जिन यात्रियों को झांसी रेलवे स्टेशन जाना है वे यही उतर जाएं,इसके बाद बस केवल झांसी बस स्टैंड पर ही रुकेगी।ये सुनकर खड़ा पुलिस वाला अपनी सीट पर लौट आया। आगे बस रुकी ,कुछ यात्री उतरे ,बस फिर चल दी।
     थोड़ी देर बाद शहर के विभिन्न हिस्सों से गुजरती बस आखिरकार झांसी बस स्टैंड आ पहुंची।पुलिस वालों की नजरे जो कि पहले ही से गुरुजी पर टिकी थी ,उन्होंने देखा कि बस के रुकने से पहले ही गुरुजी अपनी सीट से उठ कर बस के गेट तक जा पहुंचे थे, और बस के पूरी तरह रुकने से पहले ही वे गेट खोल कर उतर कर तेजी से एक ओर की तरफ लगभग दौड़ से पड़े।अब तो पुलिस वालों का धैर्य समाप्त हो चुका था ।उनका शक विश्वास में बदल गया था कि इस बुजुर्ग की गतिविधि  संदिग्ध है ,वे भी लपक कर गुरुजी का पीछा करने के लिए उतरने के लिए गेट तक पहुंचने के लिए खड़े हो गए परन्तु तब तक उनसे पहले उतरने वालों कि भीड़ गेट पर जमा हो गई थी,इस लिए जब तक वे नीचे उतरे, गुरुजी उनकी आंखों से ओझल हो चुके थे।
    दोनों पुलिस वाले बेचैनी से इधर उधर गुरुजी को ढूंढ ही रहे थे कि उन्होंने देखा कि वे बुजुर्ग आदमी चंदेरी जाने वाली बस में सवार हो रहें है।अब आगे क्या करें ,वे अभी सोच ही रहे थे कि उन्हें अचानक दो अन्य पुलिस वाले नजर आए।वे भी चंदेरी की बस के बाहर खड़े थे।पहले वाले पुलिस वाले सीधे उनके पास पहुंचे और उन्हें एक कोने में ले गए।
      "" देखो , हम आगरा पुलिस के हैं, और आगरा से आए हैं।हमे हमारे कोतवाल साहब ने जल्दी में बुलवाया था और कहा था कि झांसी जाने वाली बस से एक बुजुर्ग जिनका हुलिया उन्होंने हमे बताया था ,को आगरा बस स्टैंड पर धूंडना है और वे बुजुर्ग झांसी होते हुए चंदेरी जाएंगे तो झांसी तक तुम्हे उनके साथ जाना है परन्तु उन बुजुर्ग को ये बिल्कुल आभास नहीं होना चाहिए कि तुम उनके साथ हो।अब जल्दी से आगरा बस स्टैंड जाओ और बुजुर्ग का पूरा ख्याल रखो।ये ऑर्डर सीधे एस पी साहिब के आफिस से आया है ।हमे अब कोई शक की गुंजाइश नहीं है कि इन बुजुर्ग के साथ कुछ गड़बड़ है क्योंकि ये रास्ते में दो बार बस रुकवाकर नीचे उतरे थे ,फिर कुछ मिनटों के बाद आए थे।उतरते समय वे कुछ व्यग्र से लगते थे ।इस लिए हम आपसे कह रहें हैं कि इन बुजुर्ग पर अपनी नजरें जमाए रखना और उनका पूरा ख्याल रखना।इतने में चंदेरी जाने वाली बस के कंडक्टर ने बस चलाने के लिए सिटी बजा दी तो वे दोनों नए पुलिस वाले दौड़ कर उस बस में चढ़ गए।


       चंदेरी की ओर घुमावदार रास्तों से बस हिचकोले खाते चल रही थी ,शाम का धुंधला पन गहरे अंधेरे में डूबने को जैसे व्यग्र लग रहा था।अधिकांश सवारियां रास्ते के चारों ओर फैली हरियाली का  आनंद ले ही रही थी कि अचानक गुरुजी अपनी सीट से उठे और कंडक्टर के पास जा कर उसके कान में कुछ बोले कि उसने बस रुकवाने के लिए सिटी बजा दी।तुरंत गेट खोल कर गुरुजी नीचे उतरे और शाम के गहराते अंधेरे की ओट में खो गए।बस में बैठे पुलिस वालों के कानों में झांसी के पुलिस वालों की आशंका गूंजने लगी।उन्होंने तुरंत वाकी ताकी से अपने अधिकारी से संपर्क किया धीरे धीरे उन्हें अपना शक जाहिर कर दिया।बस के अंदर मौजूद पुलिस वालों की नजरे ओट में गायब बुजुर्ग के रास्ते पर लगी हुई थी , कि तभी वे बुजुर्ग बस की ओर वापस आते दिखाई दिए।बस एक बार फिर चंदेरी शहर की ओर चल दी।बस अभी कुछ ही किलोमीटर गई होगी कि बस के चालक को सामने पुलिस की चमकती रोशनी वाली तीन चार गाडियां नजर आईं।सड़क पर इन पुलिस की गाड़ियों ने अवरोध डाल कर बस को रोकने का संकेत दिया।जैसे ही बस रुकी ,पुलिस की गाड़ियों मै सवार पुलिस वालों ने तुरंत बस को चारों ओर से घेर लिया।उनके हाथों में हथियार किसी भी कार्यवाही को जैसे तैयार थे ।इधर बस के रुकते ही बस में बैठे पुलिस वालों ने तुरंत ही अपने हथियार बुजुर्ग की गर्दन पर तान दिए।चालक,कंडक्टर सहित सभी सवारियों को तो जैसे सांप सूंघ गया।शायद उन्हें,  टी वी और अखबारों में छाई आतंक वादियों की खबरें याद आने लगी।


     हक्के बक्के गुरुजी कुछ समझ पाते कि बस के गेट से हथियार चमकाते पुलिस वालों ने गुरुजी को घेर लिया और घसीटते से नीचे उतार लिया।वे अभी कुछ कहते की उनके हाथ हथकड़ियों से जकड़ दिए गए ,एक काला कपड़ा उनके मुंह पर डाल दिया और जीप में लाद कर ,जितनी तेजी से आए थे ,उतनी ही तेजी से चले गए।
       अगली सुबह जब गुरुजी के मुंह से कपड़ा निकाला गया तो उन्हें उजाले में आंखे खोलने में समय लगा।उन्होंने देखा कि वे एक गहरे रंग के कमरे में हैं और उनके सामने मेज कुर्सी पर एक सूट बुटेड अधिकारी सा बेठा है।कमरे के चारों ओर हथियारों से लैस पुलिस वाले तैनात खड़े है।
        गुरुजी को बहुत देर तक तो समझ ही नहीं आ रहा था कि ये सब क्यों और कैसे हो रहा है।सामने वाला उन की ओर गहरी नजर से गौर से काफी देर तक उनकी ओर देखता रहा ,परन्तु वे तो सदमे जैसी स्थिति में थे।
        आखिर कार कुछ समय बाद सामने बैठे अधिकारी ने अपनी आंखे बंद की , और एक लंबी सांस लेकर शान्ति की मुद्रा बना ली।शायद उसे समझ आ गया था कि सामने बैठा व्यक्ति इस तनाव भरे माहौल से दहशत में है।उसे अपनी ट्रेनिंग का एक पाठ याद आ गया होगा कि कभी कभी अपराधी भी ऐसे माहौल में तनाव के कारण अपने होश खो बैठता है।उसने अपने आसपास खड़े हथियारबंद पुलिस वालों को कमरे से बाहर जाने का इशारा किया तो वे सब क्षण भर में कमरे से ओझल हो गए।
     इस गहरी निस्तब्धता में  थोड़ा समय और बीता।गुरुजी के पीले पड़े चेहरे पर स्पष्ट नजर आ रहा था कि बीते कितने ही घण्टे उन्होंने घोर पीड़ा में बिताए होंगे।वे लगभग निढाल से थे और कुर्सी पर नहीं बेठे होते तो गिर ही पड़ने की स्थिति में थे।
       तभी सामने बैठे अधिकारी ने उन्हें पानी से भरा गिलास दिया ,गुरुजी ने कंपकपाते हाथों से लगभग झपटते से, गिलास को होठों से लगा लिया।निसंदेह देर से प्यासे उनके शरीर को बहुत ताकत सी प्रतीत हुई।लगा जैसे उनके अन्दर कुछ ताकत सी आई।उनकी आंखे अब पूरी तरह खुल गई ,उनके सूखे होंठ कुछ नरम से हुए ,तभी बेकरारी से उनके मुंह से निकला " बाथरूम किधर है ,मुझे म
टॉयलेट करना है।देर से शांत बैठे अधिकारी ने उन्हें गौर से देखते हुए कमरे के एक कोने की ओर संकेत किया ,मगर उधर तो कोई बाथरूम था ही नहीं।अब तक पूरी तरह सदमे से उबरते गुरुजी ने जोर से कहा ,मुझे बाथरूम जाना है वो किधर है बताओ।कुछ क्षण सोचने के बाद आखिर कार उस अधिकारी ने एक दूर खड़े पुलिस वाले को बुलाया और उसे गुरुजी को बाथरूम ले जाने का आदेश दिया।हैरान सा पुलिस वाला चुपचाप गुरुजी को ले कर कमरे से बाहर चला गया।
    थोड़ी देर बाद जब गुरुजी लौट कर आए तो जैसे वे पूरी तरह चैतन्य हो चुके थे।इससे पहले कि कमरे में बैठा अधिकार उन्हें कुछ कहता ,वे चीखते हुए बोले " ये सब क्या हो रहा है ,मुझे क्यों पकड़ रखा है ।"" अधिकारी जो उनके ,चेहरे के भावों,उम्र ,वेशभूषा से किसी गहरी सोच में डूब हुआ था,उसने बड़े ही धीमे परन्तु नरम स्वर में गुरुजी से उनका परिचय पूछा ।प्रथम बार उनसे किसी पुलिस वाले ने सामान्य स्वर में बात की थी। उसके सामने बैठे गुरुजी जैसे अपने मनोभाव रोक नहीं पाए।"" क्या मै कोई चोर डाकू हूं,क्या मै एक आतंकवादी हूं ? अरे मेरा कोई तो विश्वास करो, मै चंदेरी के सरकारी इण्टर कालेज से रिटायर प्रिंसिपल हूं। मै तो अपने एक पुराने शिष्य जो कि आजकल मथुरा के एस पी हैं ,उनसे मिलने गया था "।
     सामने बैठा अधिकारी पर जैसे बिजली सी गिरी " क्या कहा तुमने वो एस पी आपका शिष्य है ," जी हां ,वे मेरे ही शिष्य रहे हैं ! अब तो अधिकारी समेत सारे पुलिस वालों को तो जैसे सांप सूंघ गया था।
     अधिकारी ने तुरंत उन पुलिस वालों को बुलवाया जिनकी सूचना पर गुरुजी को रास्ते में ही पकड़ा गया था।
   सर ,हम तो झांसी बस स्टैंड पर रोज की तरह चंदेरी जाने वाली बस पर सुरक्षा के लिए जाते थे ।हमें तो मथुरा से आनेवाली बस से उतरे दो पुलिस वालों ने कहा था कि ये जो बुजुर्ग सा चंदेरी जाने वाली बस पर सवार हो रहा है ,उस पर नजर रखना क्योंकि उन्हें कोतवाली से सी ओ साहब ने अर्जेंट बुलवाया था और कहा था कि तुम्हे मथुरा बस स्टैंड पर झांसी जाने वाली बस पर सवार होने वाले इस बुजुर्ग का विशेष  ख्याल रखना है ,ये आदेश स्वयं एस पी साहब ने दिया है ,परन्तु ये भी कहा कि इन बुजुर्ग को तुम्हारे ऊपर जरा सा भी शक नहीं होना चाहिए कि तुम उनके साथ जा रहे हो।उनके आदेश से ही वे दोनो पुलिस वाले झांसी तक उन के साथ ही आए थे ।उन्होंने ये भी बताया था कि ये बुजुर्ग प्रायः हर घण्टे ढेड घण्टे पर बस रुकवाते और नीचे उतार कर ओट में चले जाते ।जब तक वे कोई कार्यवाही करते बस झांसी पहुंच गई थी , और ये बुजुर्ग तुरंत ही चंदेरी जाने वाली बस में बैठ गए। सर ,उनके कहे अनुसार ही हमने भी इन बुजुर्ग पर नजर रखीं और रास्ते में अंधेरा होने पर जब ये दूसरी बार बस रुकवाकर नीचे उतरे तो हमे इनकी संदिग्ध गतिविधि पर पूरा शक एवम् विश्वास हो गया तो हमने उच्च अधिकारियों को सूचित कर दिया।बाकी तो आप सब जानते ही है।
      ये सब सुन कर तो जैसे अधिकारी को सारा मांजरा समझ आ गया ।फिर भी पूरी तसल्ली के लिए उन्होंने सीधे मथुरा के एस पी को फोन लगाया और उनसे जो सुना तो जैसे उसके होश ही उड़ गए।हालांकि उसने एस पी महोदय को इतना ही बताया कि जो पुलिस वाले ,मथुरा पुलिस के कहने पर उन गुरुजी का विशेष ख्याल रखने के लिए चंदेरी तक आए थे ,उसे कंफर्म करने के लिए ही ये फोन किया था। और जब एस पी ने ये कहा कि वे उसके गुरुजी रहें हैं एवम् उनके है मार्गदर्शन के कारण वे इस पद तक पहुंचे है तो जैसे उस अधिकारी की आंखों के सामने अंधेरा सा छा गया।उन्होंने उन्हें धन्यवाद देते हुए अंत में उनसे इतना ही कहा वे गुरुजी ठीक से घर पहुंच गए हैं !
        पूरे विभाग में मचे हड़कंप के बाद पूरे पुलिस विभाग ने, बड़ी ही मुश्किल से उन गुरुजी को खयाल रखने और विशेष ख्याल रखने के बीच हुए अंतर के लिए अनेकों बार क्षमा प्रार्थना की ,तब जाकर उन सीधे साधे गुरुजी ने गुरु होने के नाते जो गलतफहमिया
 हुईं उनके लिए उन्हें क्षमा कर दिया,साथ ही बताया कि शुगर के मरीज होने के कारण उन्हें हर घण्टे ,ढेड़ घण्टे बाद मूत्र विसर्जन हेतु जाना पड़ता था ,इसी लिए यात्रा के दौरान वे बस रुकवाते थे।
     अब उस अधिकारी ने तुरंत गुरुजी के घर तक पहुंचने के लिए अपनी कार के चालक को बुलाया और गुरुजी से आग्रह किया कि अगर उन्होंने कल से घटी सारे घटना क्रम के लिए उन्हें क्षमा कर दिया है तो वे उन्हें कार से घर पहुंचने के लिए सेवा का अवसर जरूर दे।
     गुरुजी उनके आग्रह को टाल नहीं सके तो वे इस पेशकश के लिए तैयार हो गए ।स्वयं वो अधिकार उन्हें बाहर खड़ी अपनी कार तक बेठाने  आया ।गुरुजी उसमे जैसे ही बेठे तो अधिकारी ने अपने चालक से कहा कि इन्हें इनके घर तक पहुंचाकर आए , और जैसे ही कहा कि "" इनका विशेष ख्याल रखना " गुरुजी जोर से चौंक गए परन्तु तभी अधिकारी को भी अपने कहे शब्दों का ध्यान गया,उसकी इस बात पर गुरुजी जोर से बोल उठे "बस बहुत हुआ विशेष ख्याल ,मुझे तो नॉर्मल ही जाने दो ," और मुस्कुराते हुए चालक को चलने के लिए कहा। 
   अधिकारी ही नहीं लगभग सारा पुलिस थाना उन्हें जाते हुए जब तक देखता रहा जब तक कि उनकी कार आंखो से ओझल नहीं हो गईं ।
     




मंगलवार, 14 जुलाई 2020

यात्रा…………...शबरीमला मंदिर ( केरल)

                                           शबरिमाला मंदिर केरल में स्थित है यह तो शायद हम में से अधिकांश लोग जानते होंगे परन्तु केरल में किस जिले में है और और इस मंदिर की प्रसिद्धि का क्या कारण है यह शायद अधिकांश मध्य एवम् उत्तर भारतीय नहीं जानते होंगे। मै स्वयं  भी नहीं जानता था ,परन्तु जब से इस मंदिर के प्रबंधकों और महिला संगठनों के मध्य इस मंदिर में ,महिलाओं के दर्शन करने का विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा ,टी वी और समाचार पत्रों में जब मंदिर की चर्चा हुई तब मेरी इच्छा इस मंदिर के संबंध में और जानकारी लेने की हुई तो आप यह जानकर हैरान हो जाएंगे कि केवल गूगल बाबा को छोड़ कर किसी के पास कोई जानकारी नहीं थी ,।थी तो बस इतनी कि यह मंदिर केरल में है पर केरल में किधर ? इस प्रश्न के उत्तर के लिए सभी संभव सूचनाओं से कन्फ्यूज़न और बढ़ गया ,तब यह निर्णय लिया कि सीधे केरल प्रदेश कि राजधानी " त्रिवेंद्रम " ही चला जाए!
 आखिर कार एक दिन समाचार पत्र पढ़ते जब पता चला कि शबरीमाला मंदिर प्रत्येक माह  में केवल 5 दिन ही खुलता है और केवल वर्ष मे 14 नवंबर से 14 जनवरी संक्रांति तक पूरे 2 माह तक दर्शनों के लिए खुला रहता है तो मेरी उत्सुकता इस मंदिर के दर्शनों के लिए चरम पर पहुंच गई।सामने कैलेंडर देखा तो पता चला कि अरे अभी तो अक्टूबर माह चल रहा है ,तो फिर क्या था , आनन फानन में ट्रेन में सीट बुक की और चल दिया, बहू प्रतीक्षित शबरी मला मंदिर की ओर,केरल प्रदेश कि ओर , और चल दिए केरला की राजधानी " तिरुवंतपुरम" की ओर !
      अपने गृह स्थान मथुरा से लगातार 50 घंटों से भी अधिक रेल यात्रा कर रेल तिरुअनंतपुरम से थोड़ा पहले अर्नाकुलम नामक स्टेशन पहुंची तो रेलवे स्टेशन का नजारा देख चौंक पड़ा।जिधर भी दृष्टि जाती थी हर तरफ एक जैसे ही वस्त्र धारी लोगों के समूह  दृष्टि गोचर हो रहे थे, अर्थात काली लुंगी पहने ,उसके ऊपर गले तक कोई वस्त्र नहीं ,सर के ऊपर काले रंग का ही पगड़ी नुमा वस्त्र जिसके अंदर कोई पोटली सी दबी थी, एवं गले में तुलसी की माला समेत रंग बिरंगी मालाए पहने हुए लोगों के समूह ।ये दृश्य देख मुझ से जब रहा नहीं गया और निकट बैठे सह यात्री से मैने जब इस अजीब से वस्त्र पहने लोगों के बारे में पूछा तो पता चला कि ये सारे के सारे शबरी मला मंदिर के दर्शनों हेतु जा रहे है।उसी सहयात्री ने टूटी फूटी हिंदी एवं अंग्रेजी में जब यह भी बताया कि इस मंदिर के लिए इसी अर्नाकुलम स्टेशन से सीधी रेल भी सीधी चेंग नूर स्टेशन के लिए जाती है तो हम तुरंत ही इसी अर्नाकुलम स्टेशन पर उतर गए ।टिकट खिड़की पर मंदिर जाने के लिए और जानकारी लेनी चाही तो उसने रूखे से  उंगली उठा कर सूचना केंद्र की ओर जाने को इशारा कर दिया।सूचना केंद्र पर कोई था ही नहीं,ट्रेन का समय हो रहा था इस लिए भाग्य भरोसे उन अनगिनत काले वस्त्र धारण किए यात्रियों के साथ ही चेग नूर स्टेशन की ओर जाने वाली रेल में सवार हो गया।
            रेल के डिब्बे में मेरे अतिरिक्त शायद अन्य कोई यात्री हिंदी भाषी नहीं था ,इस लिए जिस से भी शबरी मला मंदिर एवम् उस तक पहुंचने के लिए जानकारी लेने की कोशिश की " हिंदी नई" अथवा " नो नॉलेज " कह कर निराश ही किया।खेर कोई अन्य चारा ना होने के कारण धीरज धर लिया कि चलो 2 घंटे पश्चात् " चेंगनुर" स्टेशन उतर कर ही जानकारी लेंगे ।इस पूरी 2 घंटों की यात्रा के दौरान बाहर रेल की खिड़की से केरल प्रदेश की हरियाली एवम् सुंदरता ने मंत्रमुग्ध कर लिया और केरल की सुंदरता को निहारते पता ही नहीं चला कि 2  घंटे की यात्रा कब समाप्त हो गई ।स्टेशन आने पर जब ये सारे काले वस्त्र वाले समूह उतरे तो संतोष हुआ कि हम सही मार्ग पर हैं,हम भी चेंग्नुर उतर गए।
          शाम के 5 बजे ,चेंग नूर स्टेशन भी काले वस्त्र पहने यात्रियों से पूरी तरह भरा हुआ था।इन्हीं के मध्य मार्ग बनाते  स्टेशन से बाहर आने पर ,मंदिर की तरफ से लगे सहायता बूथ को देख कर कुछ संतोष हुआ, और सीधे जा पहुंचे उस ओर।
          बूथ पर जा कर पहले तो अंग्रेजी में मंदिर के बारे में जानकारी लेने लगा ,तो अचानक ही एक व्यक्ति मुझे हिन्दू भाषाई जान कर जब हिंदी में बोला तो बड़ी हैरानी हुई लेकिन संतोष भी हुआ। पहली बारअब दिल खोल कर मंदिर के बारे में जान कारी ली ,तो…. सच कहता हूं ,एक बार तो होश ही उड़ गए।इतनी कठिन यात्रा ,पहले ही मै लग भग 50 घंटों की यात्रा कर के आया था , और अब जो यात्रा होनी थी ,वो तो अद्भुत ही होगी,ऐसा अब ज्ञात हुआ।अब आप भी सुनिए,इस रेलवे स्टेशन से पहले बस द्वारा पूरे 3  घंटों की बस यात्रा जो कि पूरी 100 किलोमीटर की है,करनी होगी, उसके पश्चात लगभग 5 किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद ही मंदिर पहुंच सकते हैं।अब आप पूछेंगे कि इस में अद्भुत बात क्या होगी ,तो चलिए मेरे साथ और इस अद्भुत ही नहीं ,अत्यंत ही कठिन,दुर्गम ,यहां तक कि आपकी शारीरिक क्षमताओं को परखने वाली यात्रा का अनुभव करने को !!
        सहायता बूथ के सामने ही खड़ी एक बस में जाकर सीट घेर ली,घेर ली का मतलब भयंकर दर्शनार्थियों की भीड़ में सीट का मिलना भी किस्मत की ही बात थी ! बस चलने में थोड़ा समय शेष था ,अत: पास बैठे सहयात्रियों से और जानकारी लेनी चाही तो वहीं भाषा की समस्या ,कुछ देर  बाद एक सहयात्री ने हमें दुविधा में पड़े देख मेरी, टूटी फूटी अंग्रेजी,हिंदी एवं अपनी भाषा में मेरा ज्ञान वर्धन किया।उसके अनुसार शबरी मला मंदिर का रामायण में वर्णित भील महिला शबरी से कोई संबंध नहीं है।इस मंदिर में मुख्य पूजा "भगवान अयप्पा" जो की भगवान विष्णु एवं शंकर के सम्मिलित अंश हैं, की, की जाती है।कथा के अनुसार "शबरी मला मंदिर में मकर संक्रांति के अवसर पर मंदिर के ऊपर आकाश में मध्य रात्रि को एक दिव्य ज्योति दिखाई देती है ,जिसे देखने के लिए लाखों दर्शनार्थी उस विशेष अवसर पर यहां एकत्रित होते है।इस यात्रा के लिए जो कि दक्षिण भारतीयों के लिए : मक्का मदीना " की तरह ही पवित्र है और इस यात्रा के लिए उन्हें  2 माह तक मांस मदिरा छोड़ना होता है ,जमीन पर शयन करना होता है एवम् काले रंग के वस्त्र पहन कर संयमी जीवन व्यतीत करना होता है साथ ही गले में तुलसी माला धारण करना भी आवश्यक होता है।मान्यता है कि इन नियमों का पालन करने पर ही भक्त को मकर ज्योति के पवित्र दर्श होते है ,जिस से उनकी मनोकामना पूरी होती है।इस मंदिर के दर्शनों हेतु जो भी यात्री आते हैं वे सबसे पहले केरल की सबसे बड़ी नदी पंबा या चंद्रभागा नदी में स्नान करते है ,उसके बाद ही यात्रा आरंभ करते हैं ,यात्रा समाप्त होने पर पुनः इसी नदी में स्नान करते है एवम् अपने काले वस्त्रों का यहीं पर त्याग करते है।जब ये यात्रा आरंभ होती है तो लगभग पूरे दक्षिण भारत से यात्रियों के समूह के समूह यहां दर्शन करने को आते है।इन यात्रियों के सम्मान एवम् सुविधा के लिए पूरे दक्षिण भारत में विशेष प्रबंध, कुंभ जैसे महा मेले जैसे ही किए जाते है।यह मंदिर " पेरियार राष्ट्रीय " पार्क के मध्य घने जंगलों में स्थित है, और यह राष्ट्रीय पार्क अपने भालू,शेर,हाथी आदि अनेकों जंगली प्राणियों का आवास है।इसी पार्क के किनारे दक्षिण भारत की एक सबसे बड़ी झील " वेंबनायर" है जो कि केरल का एक अत्यंत प्रसिद्ध टूरिस्ट स्थान है।
           ठीक 6 बजे शाम हमारी बस पेरियार राष्ट्रीय पार्क के मध्य स्थित शबरी मला मंदिर के लिए चल दी ।थोड़ी ही देर में तरफ गहन अंधकार और गहन जंगल में होने का आभास भी जैसे रोमांचित करने लगा।ऊंची,नीची पहाड़ी मार्ग पर बस धीरे धीरे बलखाती चल रही थी और साथ ही चल रहे थे इन पहाड़ियों ,जंगलों में स्थित विशाल,विशाल वृक्ष जिनसे इस अंधियारी रात का अंधेरा और बढ़ गया था।मार्ग के दोनों ओर पेरियार राष्ट्रीय पार्क के बोर्ड लगे हुए थे जिनमें अन्य बातों के अलावा इस जंगल में रहने वाले जीवों के बारे में लिखा था।इसी तरह 3 घंटे की यात्रा  समाप्त होने को आई तो एक अनोखा दृश्य दिखाई दिया। तेज रोशनियों और तेज आवाज में बजते दक्षिण भारतीय संगीत ने जैसे एक नई दुनिया मे ही आने का आभास करा दिया। 
               बस से उतरने पर जैसे मै किसी विशाल मेला स्थल पर आ पहुंचा था।यात्रियों के समूह के समूह ,बसों एवम् अन्य वाहनों से उतर कर एक निश्चत दिशा की ओर बढ़ते दिखाई दिए। मै भी उसी ओर चल दिया ।कुछ देर चलते ही रोशनी और तीव्र संगीत ने ध्यान आकर्षित कर दिया ।एक मध्य गति में बहती नदी ,उसमे स्नान करते हजारों लोग,चारों ओर बड़े बड़े पंडाल एक अलग ही दुनिया में आने का अहसास कराने लगा।सम्पूर्ण दृश्य,नजारे ऐसा अनुभव करा रहे थे जैसे मै सुदूर दक्षिण भारत में नहीं अपितु  उत्तर भारत में लगने वाले किसी कुंभ मेले में घूम रहा हूं। पंबा नदी पार करने के बाद मै भी मंदिर जाने वाले हजारों यात्रियों में शामिल हो गया।
         कुछ दूर चलते ही सामने सीढ़ियां आरंभ हो गई जो की लगभग सौ के करीब थी।प्रत्येक यात्री उन सीढ़ियों पर सर झुका कर चढ़ रहा था । सीढ़ी समाप्त होते ही अचानक लगा जैसे मै किसी प्रदर्शनी स्थल पर आ पहुंचा हूं ।एक विशाल आहाता,जिसके ठीक मध्य में एक माध्यम आकर का शिव मंदिर जो कि चांदी से मंढा हुआ था ,जो भी यात्री सीढ़ी चढ़ कर आता ,सर्व प्रथम इस मंदिर के आगे शीश झुकाते हुए आगे बढ़ जाता।इस मंदिर के एक किनारे पर एक विशाल पंडाल ,जो इस रात्रि के समय थके हुए यात्रियों से भरा हुआ था ।पता नहीं ,ये सब यात्रा आरंभ करने वाले थे अथवा यात्रा समाप्ति के पश्चात आराम कर रहे थे ।मैदान के दूसरे किनारे पर पुलिस की टीम मुस्तैदी से आने जाने वाले यात्रियों पर नजर रखे हुए थी।इसी एक किनारे पर कुछ कम्प्यूटर रखे थे ,जिन पर कुछ पुलिस वाले बैठ कर लिखा पढ़ी कर रहे थे,ओर उनके सामने भी छोटी छोटी यात्रियों की लाइन लगी थी। इन पुलिस कर्मचारियों के पीछे एक बड़ा सा फ्लेक्सी बोर्ड लगा था जिस पर मलयालम भाषा में बड़े बड़े शब्दों में जाने क्या लिखा था साथ ही, शायद मंदिर संबंथी साधुओं,आदि के चित्र बने हुए थे,जो मेरी भाषा की अनभिज्ञ होने के कारण मेरे लिए काला अक्षर भैंस बराबर था।मैने देखा कि अधिकांश यात्री पुलिस काउंटर पर ना रुक कर सीधे ही आगे बढ़े जा रहे थे,तो मै भी उनका अनुसरण करते हुए आगे बढ़ गया,हांलांकि यात्रा के अंत में मुझे काफी परेशानी इसी के कारण झेलनी पड़ी,जिसका वर्णन मै यात्रा के अगले पड़ाव में करूंगा।
         इस आहाते के समाप्त होते ही यात्रा मार्ग फिर छोटा हो गया जिस कारण यात्रियों का दवाब काफी अधिक हो गया।अभी यात्रा मार्ग एक दम समतल ही था ।इस मार्ग के आरंभ में जब मेरी दृष्टि अपनी बाईं ओर गई तो मै हैरान रह गया ।इस कें किनारे पर सैकडों पालकियां रखी हुई थी , और कुछ किनारे की दीवार पर टनगी हुई थी।इसके पास ही एक बोर्ड लगा था जिस पर अपरिचित भाषा में पालकी के रेट लिखे हुए थे,जिसे देखकर मेरे तो जैसे होश ही उड़ गए ,"20000  रुपए", मै इतना तो जान ही गया था कि आने और जाने के रेट होंगे।लेकिन इतने अधिक रेट का ओचित्य मुझे जब समझ आया जब मेरी यात्रा कुछ देर बाद वास्तविक रूप में आरंभ हुई ! थोड़ा आगे चलने पर एक बड़ा सा द्वार दिखाई दिया जिसके नीचे से यात्री निकाल रहे थे और ऊपर लिखा था " पेरियार राष्ट्रीय उद्यान में आपका स्वागत है "।
        इस बड़े से द्वार को पर करते ही जो सामने देखा तो एक बार तो कलेजा मुंह को आ गया ।एक दम सीधी,लगभग पचास डिग्री की चढ़ाई।सामने एक ओर बड़ा सा बोर्ड लगा था जिस पर स्थानीय ओर अंग्रेजी भाषा में लिखा था कि मंदिर कि दूरी 6 किलो मीटर है,अरे बस इतनी सी दूरी,इस से अधिक दूरी की पैदल यात्रा तो में वेश्नो देवी की यात्रा एवम् मथुरा में गोवर्धन पर्वत की यात्रा जो की लगभग 15 से 25 किलो मीटर की थी,कर चुका था। अरे इसे तो मै थोड़ी ही देर में पूरी कर लूंगा।बस फिर क्या था।भगवान " अय्यप्पा " के जय घोष के साथ मै उत्साह से भरपूर यात्रा के पहले कदम की ओर बढ़ चला।
         100 मीटर,जी हां 100 मीटर ही चला था,नहीं ,नहीं चला नहीं था ,बल्कि यात्रा मार्ग पर ,पवित्र शबरी मला मंदिर के प्रसिद्ध भगवान " अय्यप्पा " के दर्शनों हेतु चढ़ा ही था कि यात्रा का सारा जोश और उत्साह एक दम ऐसे ठंडा पड़ गया ,जैसे उफनते हुए दूध पर पानी के छीटें मरते ही उफान एक दम बैठ जाता है।जी हां ,मेरा विश्वास कीजिए ,इतनी तीव्र चढ़ाई कि मेरा विश्वास हिल गया।सच, आप जरा सोचिए,एक दम सीधी चढ़ाई,नवंबर का दक्षिण भारत का उमस और तेज गर्मी का मौसम, रात के लगभग दस बजे का समय ,अनजान भाषा का प्रदेश,कोई परिचित साथ नहीं तो क्या हाल मेरा हुआ होगा। मार्ग तो काफी चोड़ा था,मार्ग के ठीक मध्य में लोहे की रेलिंग लगी हुई थी ,जिसके दोनों तरफ यात्री आ जा रहे थे ।मैने गौर किया कि अधिकांश यात्री ,चाहे वे दर्शन हेतु जा रहे थे अथवा दर्शन करके वापस लौट रहे थे ,उस लोहे की गोल पाईप की रेलिंग को पकड़ पकड़ कर ही चढ़,उतर रहे थे। और गौर कीजिएगा कि जब यात्रा मार्ग की चढ़ाई और तीव्र हो जाती थी तब उस चढ़ाई को कम करने के लिए 10 या. 12 सीढ़ी भी बना दी गई थी।चलते चलते मेरी स्पीड अगर नापी जाती तो शायद यह एक घंटे में 100 मीटर ,जी हां ,किलोमीटर नहीं,100 मीटर ही कह रहा हूं ,नापी जाती।अधिकांश यात्री तो दस कदम चलते ,फिर सुस्ताते ,फिर पाईप पकड़ कर चढ़ने लगते।अब चूंकि मेरा इस यात्रा का कार्यक्रम निश्चित था,आने जाने का प्रोग्राम रेल रिजर्वेशन के सहित तय था,जिसके अनुसार मुझे कल सुबह तक यात्रा समाप्ति करके ,वापस चेंग नूर आ कर आगे बढ़ना था ,इस लिए मै भगवान " अय्यप्पा " की शरण में जाकर , किसी भी तरह उनके दर्शनों हेतु ऊपर मंदिर पहुंच कर ,सुबह तक वापस आने हेतु अपनी कमर ,कमर ही नहीं अपने दिल ,धड़कन को मजबूत करके ,धोंकनी की तरह चलती सांसों को थाम थाम कर ,अपनी पूरी ऊर्जा,पूरी ताकत लगा कर ऊपर चढ़ने लगा। मेरे साथ के सहयात्री ,जिन्हें शायद मेरी तरह वापसी कि कोई जल्दी नहीं थी, और जो थोड़ी थोड़ी दूर पर विश्राम करते हुए बैठते जा रहे थे ,को पीछे छोड़ते हुए ,पूरी ताकत लगा कर ऊपर चढ़ते जा रहा था।मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि शायद इस 6 किलोमीटर की यात्रा में ,मैने 16 बार सोचा होगा , कि ये यात्रा मेरे बस की नहीं।वो तो मेरा दृढ़ निश्चय,तेज लगन और भगवान " अय्यप्पा " की कृपा के कारण ही ये चढ़ाई करने में, मै सफल हो पाया।अब जरा इस यात्रा के मार्ग का वर्णन और करूं ,जिस से आपको इस यात्रा की दुरूहता का शायद थोड़ा सा अनुमान हो सके।इस 6 किलोमीटर की यात्रा में यात्रा मार्ग के दोनों ओर 3 के करीब कार्डियक सेंटर ,साथ ही दोनों ओर 6  की संख्या में प्राथमिक चिकित्सा संस्थान बने हुए थे।थोड़ी थोड़ी दूरी पर बोर्ड लगे हुए थे जिनमें दोनों भाषाओं में लिखा था कि अगर आपको यात्रा करते समय ,सांस लेने में परेशानी हो रही हो ,या छाती में दर्द होने लगे तो तुरंत नजदीक के चिकित्सा संस्थान में अपने को दिखाने में कोई लापरवाही ना करें,ये हार्ट अटैक का कारण भी बन सकता है।मार्ग के दोनों ओर मंदिर संस्थान की ओर से यात्रियों की ऊर्जा क्षमता बढ़ाने के लिए मुफ्त में एनर्जी ड्रिंक्स दिए जा रहे थे।मुझे विश्वास है कि मेरे इस वर्णन से आप इस यात्रा की दुरुहता समझ पाएं,साथ ही मुझे अब समझ भी आ रहा था कि क्यों आम यात्री इस यात्रा में ना के बराबर की संख्या में थे।जो भी यात्री थे वे अपनी मान्यता और दर्शनों के दृढ़ निश्चय के कारण ही यात्रा कर पा रहे थे।इस संबंध में आप ये भी स्मरण रखें कि मेरे जैसे गिने चुने यात्री को छोड़ कर ,प्रत्येक यात्री अपने सर पर एक पोटली भी बांधे चढ़ रहा था।वास्तव में वे धन्य थे!
          इसी तरह अपनी पूरी शक्ति लगा कर  लगभग दो घंटे लगातार चलने एवम् चढ़ाई के पश्चात आखिर कार मै अंतिम एक किलोमीटर दूरी शेष रहने के निशान पर जब पहुंचा तो ,मेरी सारी शक्ति जैसे समाप्त हो चुकी थी।पैरों में लगातार चलने के कारण तीव्र दर्द की लहर उठने,पसीने से पूरी तरह तरबतर होने के कारण आखिर कार
 मैने निर्णय किया कि मुझे अब कुछ देर अपनी यात्रा को विश्राम देना ही चाहिए। 
           मैने जिस यात्रा के जिस पड़ाव पर रुकने का निर्णय किया ,वहीं सामने पुलिस का बेरीकेट लगा हुआ था।मैने देखा कि उस बेरीकेट से दो रास्ते जा रहे हैं।मैने विश्राम करते करते एक  पुलिस वाले से जब इन दो रास्तों का कारण पूछा तो उसने " नो हिंदी" कहा कर मना कर दिया ।फिर मेरी दृष्टि एक दरोगा पर पड़ी तो मैने उन्हे जोर से आवाज लगा कर अंग्रेजी भाषा में इसका कारण जानना चाहा तो उन्होंने पहले मेरा परिचय पूछा ,मुझे सुदूर उत्तर से आया जान कार उन्हे बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने बताया कि जिन यात्रियों ने पहले पड़ाव पर ऑन लाइन रजिस्ट्रेशन कराया है वे इस बांए वाले रास्ते से जाते हैं और बिना रजिस्ट्रेशन वाले दांए हाथ से जा रहे हैं और उन्हें अधिक घूम कर एक किलोमीटर ज्यादा चढ़ाई करने के बाद ही मंदिर में प्रवेश करना होता है।अत्यधिक थकान होने के कारण मै एक एक मीटर बड़ी ही कठिनाई से चल रहा था और उनके अनुसार अभी दो किलोमीटर और चलना होगा तो मेरी तो जैसे सांस ही रुकने लगी।मैने जब उन्हें कहा कि मुझे तो पहले पड़ाव पर कोई ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन का स्थान ही नहीं दिखा तो उन्होंने बताया कि पहले पड़ाव पर जो कुछ पुलिस कर्मी कम्प्यूटर के समक्ष बैठे थे वे ही ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कर रहे थे ,एवम् इस संबंध में बड़े बड़े बोर्ड पर लिखा भी था।मैने निराशा में जैसे अपना सर ही पीट लिया।पहली बार भाषा से अनभिज्ञ होने से बहुत कष्ट एवम् अफसोस हो रहा था।मैने उनसे जब अपनी स्थिति से अवगत कराकर उनसे बांए हाथ वाले अपेक्षाकृत छोटे मार्ग पर जाने का अनुरोध किया तो उन्होंने अपनी विवशता बता कर स्पष्ट इनकार कर दिया।साथ ही उन्होंने एक जानकारी और दी कि " अय्यप्पा स्वामी " का मुख्य मंदिर रात्रि की अंतिम आरती के पश्चात ठीक 11बज कर 30 पर बंद हो जाएंगे और फिर सुबह ठीक  5 बजे खुलेंगे।साथ ही मेरा ज्ञान वर्धन और किया कि सुबह के लिए यात्रियों की लंबी लंबी पंक्ति रात की आरती के पश्चात ही लगना आरंभ हो जाएगी,जिसमें कम से कम आपका दर्शन का नंबर 6 से7 घंटे बाद ही आ पाएगा क्योंकि अधिकांश दर्शनार्थी सुबह की आरती के पश्चात दर्शन करने को सही मानते हैं। मै अवाक था।घड़ी पर नजर डाली तो ठीक 11 बजे थे।मेरे पांव ही नहीं पूरा शरीर दर्द ऑर थकान से ,एक कदम भी आगे चलने को तैयार नहीं था।इस का कारण यह भी था कि जिस यात्रा में आम दर्शनार्थी 6 घंटे से अधिक समय लगाता है उसे मैने कम समय होने के कारण 2 घंटे में ही पूरा किया है , जिसके परिणाम मेरे शरीर की ये हालत हो गई थी कि अब एक कदम भी चलना मुश्किल दिख रहा था।मेरी मुख मुद्रा देख कर उन दरोगा जी ने मुझे थोड़ी दिलासा देने की कोशिश करते हुए ये भी बताया कि इस दूसरे मार्ग वाली यात्रा हालांकि एक किलोमीटर अधिक है परन्तु चढ़ाई तो केवल एक किलोमीटर की है ,उसके पश्चात ढलान वाला मार्ग है।इस सारे वार्तालाप और विश्राम में 10 मिनट और बीत चुके थे ।स्पष्ट था कि मुझे जो भी निर्णय लेना था तुरंत लेना था , और मैने ले लिया।अपनी शेष बची खुची ताकत बटोर कर ,दृढ़ निश्चय करके ,तुरंत चलने का फैसला किया।मैने भगवान " अय्यप्पा स्वामी " से मन ही मन मुझे इस अंतिम दो किलोमीटर की यात्रा इन बीस मिनट में करने के लिए शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की , और में सब कुछ भूलकर आगे चल दिया।
       मै दर्शनों के लिए इतना लालायित था कि उस शेष दो किलोमीटर में , मै शायद जितना अधिक तेज चला था ,आज सोचता हूं कि अगर उस समय कोई मैराथन रेस होती तो मै बड़ा से बड़ा रिकॉर्ड अपने नाम कर लेता।
        कहते हैं ना कि इच्छा शक्ति से भगवान भी मदद करते हैं , मै मंदिर बंद होने से ठीक 5 मिनट पहले मंदिर परिसर के विशाल दरवाजे तक आ पहुंचा था।नीचे जहां तक मेरी दृष्टि जाती थी हर तरफ जगमगाते प्रकाश की चकाचौंध के बीच लाखों ,लाखों दर्शनार्थियों की भीड़ मौजूद थी।दरवाजे के बाद दूर दूर तक स्टील की रेलिंग का जाल बिछा था ।इस रेलिंग के अंदर यात्री को शायद एक किलोमीटर की और यात्रा जितना चलना पड़ता होगा ,परन्तु इस दर्शन के आज के अंतिम अवसर पर शायद उपस्थित अधिकांश यात्री दर्शन कर चुके थे और वे सब के सब जिधर तक नजर जाती थी , आड़े ,तिरछे ,इधर उधर ,जिसको जहां भी जगह मिल गई थी वहीं थकान के कारण गहरी निद्रा में डूबे हुए थे।अब मै जान चुका था कि वे क्यों बेहोशी सी अवस्था में बेतरतीब पड़े हुए थे।
      इस अंतिम 5 मिनट की शेष अवधि में मेरे अतिरिक्त कोई और यात्री अब मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग पर नहीं जा रहा था।यात्रा के आरंभ में जो यात्रियों के समूह मेरे साथ चले थे या जो यात्रा के मध्य मुझे मिले थे ,उन्हे मै कब का बहुत पीछे छोड़ चुका था और जो अब भी थोड़े से यात्री मेरे साथ यहां तक आ पहुंचे थे ,उन्हे मेरी जितनी दर्शनों की जल्दी नहीं थी।वे तो शायद सुबह ,सुबह उठकर ही दर्श करने वाले थे।
         अतः जब मै मंदिर, जो कि अब मेरे सामने ही था ,उस तक जाने वाले मार्ग के गेट को एक पुलिस वाला बंद कर रहा था।जैसे ही उसने गेट बंद किया कि मेरे साथ ही एक अन्य दर्शनार्थी भी उस गेट के सामने जा पहुंचा।पुलिस वाले ने इनकार में सर हिला दिया कि अब गेट नहीं खुलेगा।अभी मै कुछ सोचूं कि तभी मेरे साथ के यात्री ने अपनी भाषा में उस पुलिस वाले से कुछ कहा और साथ ही अपने हाथ में थामे ,लोकल भाषा में टाइप किया एक पत्र जिसके आरंभ मै सरकारी " अशोक " का चिन्ह छपा था उसे दिखाया,साथ ही अपनी भाषा में उस से जोरदार आवाज में बहस की,जिसके परिणाम स्वरूप उसने उसके लिए गेट खोल दिया।अब क्या था मेरे समक्ष, अभी नहीं तो कभी नहीं की स्थिति थी।मैने भी तुरंत निर्णय लेते हुए अपनी जेब में रखे स्टेट बैंक के आई कार्ड ,जिस पर बड़ा सा स्टेट बैंक का नीला, गोल चिन्ह अंकित था उसे दिखा दिया,साथ ही उससे हिंदी,अंग्रेजी भाषा में दर्शन के लिए मुझे भी प्रवेश करने का अनुरोध किया।साथ ही मैने जोरदार शब्दों में कहा कि भाई , मै भी एक सरकारी अधिकारी हूं,अकेला हूं ,बड़ी दूर दिल्ली से आया हूं,कृपया कैसे भी मुझे अंदर जाने दो। मै अच्छी तरह जानता हूं कि एक साधारण पुलिस कर्मी होने के कारण ना तो उसे अंग्रेजी आती होगी और ना ही हिंदी ,पर अचानक उसने मुझ से एक ही शब्द बोला " दिल्ली " और आगे की भाषा मेरे समझ के बाहर थी,उसने मुझे अंदर आने का संकेत कर दिया ।मेरे पास अब कुछ ही मिनट बचे थे दर्शन के लिए इस लिए बिना उसे धन्यवाद देते मै तुरंत मंदिर की ओर दौड़ पड़ा।
          " भगवान अय्यप्पा स्वामी " का मंदिर ,जिसके समक्ष मै पूर्ण श्रद्धा,समर्पण से ,हाथ एवम् आंख बंद किए खड़ा था ,जिसके बारे में,मैने वर्षों पहले अचानक ही टी वी पर सुना था ,जो शायद मेरे मूल स्थान से हजारों किलोमीटर दूर था ,जिसके बारे में अधिकांश उत्तर ,मध्य भारत के लोगों की जानकारी ना के समान थी, मार्ग के समस्त कष्ट को पूरी तरह विस्मृत करके ,उस पवित्रतम मंदिर के समक्ष खड़ा था।सत्य कहता हूं ,उस वक्त मै मंदिर के समक्ष नहीं अपितु एक अलौकिक दुनिया में खड़ा था।तभी परिसर में लगे बड़े स्पीकरों से गूंजती आरती ने जैसे मुझे वर्तमान दुनिया में ला खड़ा किया।आरती शुरू हो चुकी थी।मंदिर के चारों ओर खड़े दर्शनार्थियों के विशाल समूह उस आवाज के साथ ,अपनी आवाज में अपनी श्रद्धा प्रकट कर रहे थे।अनजानी भाषा होने के कारण ,मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था ,परन्तु उस समय मैने हृदय से पहली बार अनुभव किया कि प्रार्थना की एक ही भाषा होती है और वो होती है केवल और केवल श्रद्धा और श्रद्धा। मै भी उस समय भाषा ,स्थान को भूलकर आरती की प्रत्येक अंतिम पंक्ति  का अंतिम शब्द जो " अय्यप्पा स्वामी शरणम् " की होती थी ,पूरी शक्ति से बोलता था " अय्यप्पा स्वामी शरणम् " ।
       आरती समाप्त हुई ,पवित्र दर्शन हुए ,अपने भाग्य को सराहते ,जैसे ही में आगे बढ़ा तभी जाने किधर से गेट बंद करने वाला सिपाही मेरे सामने आ खड़ा हुआ " प्रसाद ,प्रसाद " ही मुझे समझ आया और समझ आया कि वो अनजानी भाषा में मुझे संबोधित करते हुए मंदिर के एक कोने में खड़ा होने के लिए संकेत कर रहा था।आरती के पश्चात ,मंदिर के कपाट बंद करके  एक पुजारी अपने हाथ से अल्प मात्रा में जहां चरणामृत जैसी लेकिन थोड़े काले रंग की ,तीव्र गंध वाला पेय दे रहा था ,वहीं दूसरा पुजारी प्रसाद जैसी कोई अनोखी परन्तु दिव्य स्वाद वाली वस्तु दे रहा था।हजारों की भीड़ ,उन के लिए जैसे चीख चीख कर ,एक दूसरे को धकियाते ,हाथ बढ़ा रहे थे वहीं उस पुलिस वाले की सहायता से उसने मुझे जिस स्थान पर खड़ा होने के लिए कहा था , और जो पुजारियों के एक दम समक्ष था ,आसानी से मुझे ,भगवान अय्यप्पा स्वामी की कृपा रूपी ,अमृत रूपी ,चरणामृत एवम् प्रसाद ,आसानी से मिल गए थे।मैने इसे साक्षात भगवान की कृपा मानते हुए उस पुलिस वाले को हृदय से धन्यवाद देते हुए अपनी आंखे फिर एक बार बंद कर ली।
            मनोवांछित इच्छा पूर्ण होते ही जैसे मुझ पर थकान हावी हो गई , मै एक कोने में जैसे पसर सा ही गया।कुछ देर के विश्राम के पश्चात पीड़ा से जूझते मैने अपने पैरों को कुछ आराम देने हेतु अपने हेंड बेग से पैरों पर लपेटने वाली " क्रेप बैंडेज निकली , दोनों पैरों पर बांध ली।  कुछ समय विश्राम के पश्चात् मुझे स्मरण हो आया कि मुझे अभी वापस भी जाना है , मै खड़ा हो गया।जैसे चमत्कार हो गया ,मैने महसूस किया कि कुछ देर पूर्व जहां मै एक कदम भी चलने की स्थिति में नहीं था ,वहीं मै अपने को लगभग पूर्ण स्वस्थ महसूस कर रहा था।इसका अनुभव मैने अपनी पूर्व कि कई यात्राओं में भी किया है ,जिसका में एक ही उत्तर समझता हूं कि उद्देश्य पूर्ण होने पर हम यात्रा से होने वाली सम्पूर्ण थकान और कष्ट भूल जाते हैं और एक नई ऊर्जा से भरपूर तरो ताजा  हो जाते हैं।
            अब इस ऊर्जा को मै व्यर्थ में नहीं गंवाना चाहता था ,इस लिए उठ खड़ा हुआ ।वापस जाने से पहले मै इस पवित्र " शबरी मला " मंदिर की पूर्ण भव्यता को अपनी स्मृति में हमेशा हमेशा के लिए सुरक्षित रखने के लिए ,उसके अवलोकन हेतु सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा।अब मैने जाना कि ये स्थान तो इतना विशाल है जिसकी कल्पना हम उत्तर भाषी शायद ही कर पाएं।अनगिनत भवन ,विशाल पक्के मैदान ,बड़े बड़े मंच ,जगह जगह अनेकों काउंटर विभिन्न कार्यों के लिए बने हुए थे।कोई भी स्थान ऐसा नहीं था जहां ये काले वाटर धारी यात्री ना समाए हो।यहां एक नहीं अपितु विभिन्न देवी देवताओं के सुंदरतम स्वर्ण जड़ित मंदिर बने हुए थे जी एक अलग ही दुनिया का अहसास करा रहे थे। अनेकों यात्री अपने स्वजनों के साथ पूजा पाठ में लगे हुए थे।इस मंदिर की एक और विशेषता से मेरा परिचय हुआ कि प्रत्येक यात्री कुछ ना कुछ दान अर्पित कर रहा था।अधिकांश यात्री इन दान की सामग्री को अपने सर पर ही रख कर ,मान्यता पूर्ण होने से ,आभार प्रकट करने के लिए ,काउंटरों पर जमा कर रहे थे। मै पुनः हैरान था कि मुझसे खाली हाथ नहीं चढ़ा का रहा था ,वहीं ये श्रद्धालु उसे अपने सर पर रख कर ही लाए थे।धन्य है उनकी श्रद्धा एवम् धन्य है ये भक्त और उनकी भक्ति। मै पुनः एक बार भगवान" अय्यप्पा स्वामी की जय " के उद्घोष के साथ वापसी की अपनी यात्रा  के लिए बढ़ गया!